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ज़िन्दगी अब अंधेरे ही अंधेरे हैं 
June 4, 2020 • आशीष दशोत्तर  • लेख

*आशीष दशोत्तर 

वह पिछले एक माह से लगातार यह चाह रहा था कि किसी तरह उसे अपने शहर आने की अनुमति मिल जाए। दो बार उसने कोशिश भी की लेकिन असफल रहा। एक बार अनुमति लेकर आ भी गया मगर घर तक नहीं पहुंच पाया। अंततः अब जबकि लाकडाऊन समाप्त हो चुका है और अनलॉक का पहला चरण प्रारंभ है, वह अपने परिवार के साथ अपने घर लौट आया।
पिछले बीस वर्षों से वह महानगर में नौकरी कर रहा है।  जब नौकरी लगी तब घर वालों ने यह सलाह दी थी कि बाहर जाकर नौकरी करना बहुत मुश्किल है, मगर उस समय उसमें जोश था, जज़्बा था, कुछ कर गुज़रने की क्षमता भी।  वह गया और वहां एक निजी संस्थान में नौकरी करने लगा।  धीरे -धीरे उसने अपने परिवार को वहां स्थापित किया। बच्चों को वहां के स्कूल में दाखिला दिलवाया। परिवार वालों को भी महसूस हुआ कि बच्चे स्थापित हो चुके हैं। 
पिछले 20 वर्षों में उसे कुछेक  बार ही महसूस हुआ कि यहां सब कुछ सुरक्षित नहीं है, मगर उन्हें लौटने का ख्याल उसके मन में कभी नहीं आया। इस बार जब वह लौटा और मिला तो उसने कहा कि अब वह उस महानगर में नहीं जाएगा। यहीं अपने छोटे से शहर में रहकर ही कोई काम करेगा। अपने पुश्तैनी कार्य को देखेगा या जो भी काम मिले वह करेगा। अच्छे पैकेज, बड़े शहर की जीवनशैली, वहाँ के तौर तरीकों की प्रशंसा करते नहीं अघाते उसके मुंह से यह बात सुन मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। अब तक अपने छोटे से शहर को बहुत पिछड़ा बताते हुए वह जिस महानगर और जहां वह नौकरी करता है उस संस्थान की तारीफ करते हुए नहीं थकता था। अचानक ऐसा क्या हुआ कि उसने यह निर्णय लिया । लाकडाऊन के दौर ने उसे ज़िंदगी के नए फलसफे से परिचित करवा दिया।  इन साठ दिनों में उसने सैकड़ों बार अपने छोटे शहर को फिर से अपनाने की बात कही और यहाँ  आ कर उसने यही अपने पैर जमाने का संकल्प लिया ।
क्या इसे उसके जीवन में आया बदलाव कहेंगे या फिर मौजूदा हालात द्वारा उत्पन्न मजबूरी। उसने बताया कि जब से लाकडाऊन शुरू हुआ उसके संस्थान ने लगभग अस्सी फीसदी कर्मचारियों को यह सूचना दे दी  कि वे अगली सूचना तक स्वयं को नौकरी से वंचित माने। जिन बीस फीसदी कर्मचारियों को नौकरी पर रखा गया उन्हें भी आधे वेतन पर काम करने के लिए कहा गया । सवाल पूछने की किसी में हिम्मत नहीं थी, क्योंकि अस्सी प्रतिशत कर्मचारियों के हाल को देखते हुए शेष  ने भी अपनी जुबान बंद ही रखी और 'वर्क फ्रॉम होम' कल्चर को अंगीकार करते हुए आधे वेतन में काम करने में जुट गए। इन 20 प्रतिशत में वह भी शामिल रहा। जब लॉक खोलने की बारी आई तब भी उन अस्सी प्रतिशत कर्मचारियों को नौकरी पर आने संबंधी सूचना संस्थान द्वारा नहीं दी गई और इन बीस प्रतिशत कर्मचारियों को भी पूरा वेतन देने संबंधी कोई घोषणा संस्थान द्वारा नहीं की गई । ऐसी परिस्थिति में उसके मन में एक भय पैदा हो गया । उसे वहां पहली बार अंधकारमय भविष्य की आहट सुनाई दी।उसे लगा कि आज यह कंपनी आधे वेतन पर काम करवा रही है हो सकता है कल उसे भी मुक्त कर दे। महानगर के खर्चे, बच्चों की पढ़ाई और अन्य ज़रूरतों को वहन करना आधी तनख्वाह में संभव नहीं है , इसलिए उसने अपने छोटे शहर को ही अपनी कर्मस्थली बनाने विचार किया । मगर इन बीस वर्षों में जो कुछ उसने खोया है ,क्या उसे कोई लौटा सकेगा?
यह व्यथा एक युवा की है, और इस देश में करोड़ों ऐसे युवा हैं जो इस वक्त अपना रोजगार जाने से चिंतित हैं । जिस जगह काम किया करते थे, वहां से निकाल दिए जाने के बाद इधर-उधर घूम रहे हैं। उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा है।  आत्मनिर्भर बनने का झुनझुना थामे ये भटक रहे हैं।  अखबार बताते हैं कि अपने मध्यप्रदेश में ही लाकडाऊन से दस लाख से अधिक लोग बेरोजगार हो चुके हैं। भारतीय आर्थिक निगरानी केंद्र के आंकड़ों को देखें तो पिछले 2 महीनों के दौरान बेरोजगारी की दर 14 गुना बढ़ गई है। ऐसे बेरोजगार जो किसी निजी संस्थान में कार्यरत हैं, किसी निर्माण कंपनी में, ऑटोमोबाइल सेक्टर में, पर्यटन के क्षेत्र में, शिक्षा संस्थानों में ,कोचिंग सेंटर में वे सब बेरोजगारी का लेवल लगाकर इस वक्त घूम रहे हैं।  सरकार के पास ऐसे बेरोजगारों को रोज़गार देने की कोई योजना नहीं है। इन बेरोजगारों को मुआवजा दिए जाने की बात की जा रही है, लेकिन यह मुआवजा यदि मिल भी जाए तो इनके जीवन के कितने दिन गुजरेंगे यह कोई नहीं बता सकता । ऐसे हालात में ये अधेड़, उम्रदराज बेरोजगार क्या करें । किस तरह अपने जीवन को गुजारे। यह समझ नहीं आ रहा है। सरकारों के पास कोई ठोस योजना नहीं है। हर तरफ आश्वासन हैं, मगर इन आश्वासनों के बीच जो अंधेरा इनकी आंखों के सामने छाया है, वह कब दूर होगा कहा नहीं जा सकता।

*रतलाम(म.प्र.)

 

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