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ज़िम्मेद़ारी
July 19, 2020 • ✍️डॉ. रमेशचंद्र • कहानी/लघुकथा


✍️डॉ. रमेशचंद्र

रामखिलावन अपने गांव के एक बड़े किसान थे। उन्होंने अपनी कृषि भूमि किराये पर दे रखी थी तथा शहर के बड़े मकान में अपनी पत्नी रामप्यारी और तीनों बेटों के साथ सुख से रहते थे।  रामखिलावन के तीनों बेटे जैसे-जैसे बड़े होते गये, उन्हें काम-धंधे से लगाते गये और उनका विवाह करते गये।  शहर का मकान काफी बड़ा था और उसमें अलग-अलग क्ई कमरे थे, जो सर्वसुविधायुक्त थे। रामखिलावन और उनकी पत्नी ने बेटों के भविष्य में अलग होने के पहले ही उन्हें अलग कर स्वतंत्र रुप से रहने और अपनी स्वतंत्र गृहस्थी संभालने की ज़िम्मेद़ारी सौंप दी। इससे तीनों बेटों के साथ तीनों बहुएं भी प्रसन्न एवं संतुष्ट थी। उन्हें हर प्रकार की स्वतंत्रता थी और किसी बात का बंधन नहीं था। सब रहते तो एक ही मकान में, परंतु सबकी रसोई अलग बनती थी। अतः परस्पर किसी प्रकार के दबाव व हस्तक्षेप का प्रश्न ही नहीं था।
लेकिन समय सदा एक जैसा कहां रहता है। धीरे-धीरे समय के साथ-साथ रामखिलावन और उनकी पत्नी रामप्यारी बूढ़े और बीमार होते गये। अब रामप्यारी से घर का काम-काज़ नहीं हो पाता था। बीमार रहने और इलाज़ कराने के बावज़ूद वह बहुत कमज़ोर हो गयी थी। इससे रामखिलावन को बड़ी असुविधा होने लगी। उन्हें न समय पर न चाय-नाश्ता मिल पाता था न ही भोजन।  
एक दिन रामप्यारी ने अपने मन की बात बताते हुए अपने पति रामखिलावन से कहा -"देखो! मुझसे अब पहले की तरह घर का काम नहीं हो पाता है, बीमार भी रहती  हूं। इसलिए तीनों बेटों में से किसी को भी अपने साथ रहने के लिए कहो। "
रामखिलावन भी इस कठिनाई से परिचित धे, फिर भी उन्होंने अपनी आशंका व्यक्त करते हुए रामप्यारी से कहा- "हमने ही अपने तीनों बेटों को हमसे अलग-अलग रहने का फैसला बहुत सोच-विचार कर किया था। अब हम अपने मुंह से उन्हें फिर से साथ रहने का कैसे कह सकते हैं। यदि हम कह भी दें तो क्या वे अब राज़ी होंगें। अब तक तो वे स्वतंत्र और आत्मनिर्भर रहने के आदी हो गये होंगें। ऐसी दशा में उन्हें साथ रहने का कहना मुझे तो उचित नहीं लगता। "
इस पर रामप्यारी ने कहा -"तुम मेरी हालत तो देख ही रहे हो, घर के काम-काज़ मुझसे अब बनते नहीं हैं। नौकरानी रखना मैं ठीक नहीं समझती। घर का ही कोई सदस्य घर में रह कर काम करे तो अच्छा रहता है। "
"हां, मैं तुम्हारी  बात से सहमत हूं, मगर बेटों से कहना मुझे अच्छा नहीं लग रहा है, परंतु तुम चिंता न करो, मैं तुम्हारे कहने पर उनसे साथ रहने की बात करता हूं। "
फिर एक दिन मौका देख कर  रामखिलावन ने तीनों बेटों को अपने कमरे में रामप्यारी के सामने बुलाया और कहा- "बेटा! तुम अपनी मां की हालत तो देख ही रहे हो, अब इससे घर का कोई काम-काज़ नहीं हो पाता है। अक्सर बीमार भी रहती है..।"
तीनों बेटे  अपने पिता की बातें सुन रहे थे और अपनी मां को देखते भी जा रहे थे, पर कुछ बोल नहीं रहे थे। रामप्यारी भी चुप बैठी आपने तीनों बेटों को देख रही थी। 
रामखिलावन ने बारी-बारी से सबको देखा, फिर बोले- "बेटा! मेरा तुमसे यही आग्रहपूर्वक कहना है कि तुम तीनों भाईयों में से कोई भी हमारे साथ रहना शुरू करदे और हमारी खाने-पीने की सारी ज़िम्मेद़ारी ऊठाएं..। "
रामप्यारी ने भी कराहते हुए यही बात दोहराई। तीनों बेटे अपने मां -बाप की यह बात सुन कर उलझन में पड़ गये और एकदूसरे का मुंह ताकने लगे...। 
*इंदौर (म.प्र.)
 

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