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युग बीते
December 9, 2019 • अंकुर सहाय ‘अंकुर' • गीत/गजल

*अंकुर सहाय 'अंकुर'

युग  बीते!
कितने युग बीते ।।
     घाव लगे अन्तस में गहरे,
     सांसों पे यादों के पहरे।
     आशा की मोती की खातिर ,
     आकर हम कूलों पर ठहरे ।।
नेह कलश आंसू से भरते
सुख के सागर रीते-रीते ।
युग बीते! कितने युग बीते ।।
       गहन तिमिर बादल धमकाए ,
        बिजली चमके,आस जगाए।
       अधर खिले स्मित की रेखा ,
       काजल नैनों में बलखाए ।।
राह निहार रहे हैं तेरी
मरते-मरते ,जीते -जीते ।
युग बीते! कितने युग बीते ।।
       भूल गए झूले सावन के,
       रंग बदन के , रूप सजन के ।
       और हिना की रची हथेली ,
       सपने बचपन के, यौवन के।
प्रेम सुधा की प्यास बढ़ी है,
हालाहल नित पीते-पीते ।।
युग बीते! कितने युग बीते ।।
        चाह मिलन की रही अधूरी,
        धड़कन से धड़कन की दूरी ।
        रखती है ये बैरी दुनिया ,
        मुख में राम ,बगल में छूरी ।।
तार-तार जीवन की चादर,
रोज रहे हम सीते -सीते ।।
युग बीते! कितने युग बीते ।।
 
*अंकुर सहाय ''अंकुर''
ग्राम-पो0-खजुरी
जिला-आजमगढ़ उ0प्र0  मो.09454799898
 
 
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