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यू एस के सियाटल क्षेत्र स्थित वुडिनविल सिटी में हिन्दी की धूम
January 31, 2020 • शब्द प्रवाह समाचार • समाचार

गुरुग्राम की साहित्यिक एवम सामाजिक संस्था "परम्परा" द्वारा भारतीय 'गणतन्त्र दिवस' तथा 'वसन्त पँचमी' के शुभ अवसर पर एक काव्य गोष्ठी का आयोजन यू एस के सियाटल क्षेत्र स्थित वुडिनविल सिटी में किया गया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में मर्सर आयरलैंड से पधारे वरिष्ठ समाजसेवक डॉ प्राण वाही उपस्थित रहे। अध्यक्षता रही फेडरल वे से पधारीं श्रीमती शकुन शर्मा की। कार्यक्रम का संयोजन परम्परा संस्था की संयोजिका इन्दु "राज" निगम द्वारा किया गया। ज्ञात हो कि गोष्ठी का आयोजन परम्परा संस्था के संस्थापक राजेन्द्र निगम "राज" की सुपुत्री मुदिता निगम तथा दामाद आशीष सिंह के निवास पर किया गया।

गणमान्य साहित्यकारों तथा अतिथियों में श्रीमती सन्तोष वाही, श्री सुभाष शर्मा, श्रीमती फरहा सैयद, श्रीमती आभा सक्सेना, श्री राहुल उपाध्याय, श्री प्रदीप त्रिवेदी, श्रीमती रोहिणी त्रिवेदी, श्री शकेब, श्री प्रेम दयाल श्रीवास्तव, श्रीमती प्रेमलता श्रीवास्तव, श्री संजय श्रीवास्तव, श्रीमती विनीता श्रीवास्तव, श्री भाविक देसाई, श्रीमती रीता सिंह, श्री चेतन श्रीवास्तव, श्रीमती निहारिका श्रीवास्तव, श्री मनीष गुप्ता एवम श्रीमती छंदा गुप्ता की गरिमामयी उपस्थिति रही। 
 
कार्यक्रम का शुभारंभ मंचासीन अतिथियों द्वारा दीप प्रज्ज्वलित करके किया गया। ततपश्चात भारत से प्राप्त सूचनाओं के अनुसार गुरुग्राम के वरिष्ठ साहित्यकार श्री मुकुल शर्मा, दिल्ली की सुप्रसिद्ध सहित्यकारा श्रीमती उर्मिल भूषण तथा हापुड़ की प्रसिद्ध कवियत्री डॉ रश्मि के आकस्मिक निधन पर मौन रखकर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की गई। इसके बाद इन्दु "राज" निगम द्वारा भावपूर्ण सरस्वती वंदना प्रस्तुत की गई। कार्यक्रम में कुशल संचालन रहा परम्परा संस्था के संस्थापक राजेन्द्र निगम "राज" का । गोष्ठी का विशेष आकर्षण रहा-कविता के पश्चात उपस्थित अतिथियों द्वारा हिन्दी फिल्मों के गीत गायन के। जिसमें पाखी गुप्ता, पीहू गुप्ता तथा सबसे छोटी बच्ची, चार वर्षीय आशिरा सिंह आदि बच्चों द्वारा भी गीत प्रस्तुत किए गए। इसके अतिरिक्त उपस्थित वरिष्ठ नागरिकों में लगभग 90 वर्षीय श्री प्रेम दयाल श्रीवास्तव द्वारा भी रचना प्रस्तुत की गई। विदेश में रहकर भी हिन्दी के प्रति इतना प्रेम एवम समर्पण देखकर मन भावविभोर हो गया।

कवियों द्वारा गणतन्त्र दिवस तथा वसन्त के अतिरिक्त अन्य विविध विषयों पर रचनाएँ प्रस्तुत की गई। रचनाओं की कुछ बानगी इस प्रकार है-

प्रदीप त्रिवेदी- 
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अतीत का पिटारा खोलकर जब जब भी अन्दर देखा
ज़िंदा होते रहे कुछ ऐसे आलम जिनका सानी नहींमिला

भाविक देसाई-
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गुलों को सुनना ज़रा, सौ सदाएँ भेजी हैं
गुलों के हाथ बहुत सी, दुआएँ भेजी हैं

आशीष सिंह-
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थोड़ा धीरज और धरो माँ
अभी बहुत मैं छोटी हूँ

मनीष गुप्ता-
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काँटों से भरी राहें, दलदल से सने पड़ाव
उतने आगे बढ़े हम, जितने मिले हैं घाव

विनीता श्रीवास्तव-
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कौन कमी है माधो मुझमें,मोरी छवि ना भाई तोहे
राधा में क्या रूप छुपा है,राधा ही क्यों भाई तोहे

इन्दु "राज" निगम-
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शहीदों की शहादत को चलो गीतों में ढालें हम
नहीं कुछ और कर सकते तो उनके गीत गा लें हम

फरहा सैयद-
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कई बार मेरे दिल ने पुकारा उसे ज़रूर
कई बार अपने दिल में पशेमां भी मैं हुई

आभा सक्सेना-
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हवाएँ मुल्क से चलती हैं तो पहचान लेती हूँ
मैं अपनी माँ की धड़कन को यहाँ महसूस करती हूँ

राहुल उपाध्याय-
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कभी जलती थी शमा रोशनी के लिए
आज जलती फ़क़त खुशबुओं के लिए

राजेन्द्र निगम "राज"-
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सूरज की निगाहों से बचाकर के लाए थे
हम धूप मुट्ठियों में छूपाकर के लाए थे

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