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ये सुनसान राहे वीरान चौराहे
April 9, 2020 • शिव कुमार दुबे • कविता

*शिव कुमार दुबे
 
ये सुनसान राहे वीरान चौराहे
हवाएं बड़े सुकून में
समन्दर से लेकर ताल तक
ले रहे चैन की सांस
दौड़ती गाड़ियां चल रही नावे
उड़ते जहाज अब सब शांत
पेड़ पौधे बड़े हैरान
दे रहे स्वच्छ हवाएं
डगर डगर शोर है
हर तरफ चैन का जोर है
आदमी कैद है घर मे
बाहर पंछी स्वछद है
प्रकृति बहुत प्रसन्न है
आज अहम आदमी का चूर है
क्या कीमत है धन और दौलत की
सब व्यस्त है बचने जान अपनी अपनी
कुछ है जो फैलाना चाहते है
जहर फिजाओ में अभी भी
उन्हें कोई जगाओ कि
मानवता ही सच्चा धर्म है
कौन कहता है कि
खुदा ज़न्नत में रहता है
हमे भी बताओ कि वो
कहाँ रहता है
हमने सीखा बस यही
खुद सबके दिलों में रहता है
सदा करते जो प्रार्थना सच्ची
इबादत करते जो ईमान से
और परस्पर रहते जो भाईचारे से
वही सच्चा खुद रहता
वही सच्चा इंसान होता
प्रकृति के विषाणु संक्रमण ने
कितना बोना बना दिया इंसान को
घर मे कर दिया कैद सबको
अब तो समझो अपनी औक़ात
प्यारो इस नशवर जहां में
प्रेम की फुहार उड़ा दो
जे जमी ही जन्नत ये जमी ही खुदा
का घर इसे सँभालो यारो
 
*शिव कुमार दुबे, इंदौर
 

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