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वो..... नाचती थी ?
April 27, 2020 • प्रीति शर्मा 'असीम' • कविता
*प्रीति शर्मा 'असीम'
 
जीवन की,
हकीकत से ,
अनजान। 
अपनी लय में,
अपनी ताल में,
हर बात से अनजान ।
 
वो...... नाचती थी ?
सोचती.......... थी?
 
नाचना ही..... जिंदगी है ।
गीत- लय- ताल ही बंदगी है।
 
नाचना........ ही जिंदगी है ।
नहीं ........ शायद
नाचना ही.... जिंदगी नहीं है ।
 
इंसान हालात से नाच सकता है।
मजबूरियों की ,
लंबी कतार पे नाच सकता है।
 
लेकिन ...........
अपने लिए ,
अपनी खुशी से नाचना। 
जिंदगी में यहीं,
संभव -सा नहीं।
 
हकीकतें दिखी...... 
पाव थम गए। 
 
फिर कभी सबकी आंखों से,
ओझल हो ......!!!
नाचती .....अपने लिए।
 
लेकिन जिम्मेदारियों से ,
वह भी बंध गए।
 
 फिर गीत -लय -ताल,
 न जाने कहां थम गए ।
 
पांव रुके,
और हाथ चल दिए। 
शब्द नाचने लगे।
जीवन की,
हकीक़तों को मापने लगे।
 
उन रुके पांवों को ,
आज भी बुलाते हैं ।
तुम थमें हो ,
नाचना भूले तो नहीं ।
 
वो.....नाचती थी।
कभी हकीकतों से परे,
आज ......भी नाचती है ।
हकीकतों के तले ।।
 
*प्रीति शर्मा 'असीम'
नालागढ़ हिमाचल प्रदेश
 

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