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विश्ववाणी का गज़लकार स्मरण पर्व
May 23, 2020 • पुनिता भारद्वाज • समाचार

जबलपुर, । विश्ववाणी हिंदी संस्थान अभियान जबलपुर के 19 वे दैनंदिन सारस्वत अनुष्ठान  गज़लकार स्मरण पर्व  का श्री गणेश मुखिया इंजी सलीम अंसारी  व्  शायर अनिल अनवर, जोधपुर द्वारा माँ सरस्वती पूजन से हुआ। कोकिलकंठी गायिका-शिक्षिका मीनाक्षी शर्मा 'तारिका' ने आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' द्वारा ग़ज़ल विधा में कही गयी सरस्वती  वंदना " शारदे माँ! आ गये हम द्वार तेरे कर कृपा / शब्द सुमनों का लिए गलहार मैया कर कृपा'' गाकर करतल ध्वनि पाई। विषय प्रवर्तन करते हुए संयोजक आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' ने ग़ज़ल के संक्षिप्त इतिहास पर प्रकाश डालते हुए नई पीढ़ी को ग़ज़ल के विकास में नींव का पत्थर रहे ग़ज़लकारों के काम से नयी पीढ़ी को अवगत कराने की जरूरत बताई। मीना भट्ट ने मिर्ज़ा ग़ालिब की प्रसिद्ध ग़ज़ल 'दिले नादां तुझे हुआ क्या है' का गायन किया। डॉ. मुकुल तिवारी ने दुष्यंत कुमार की ग़ज़ल 'हो गयी है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए'  प्रस्तुत की। 

डॉ अरविन्द श्रीवास्तव 'असीम' ने शिवकुमार अर्चन की ग़ज़ल 'हर होंठ पर लिखूंगा मैं एक प्यार की ग़ज़ल ' प्रस्तुतकर वाहवाही पाई।  जोधपुर की मशहूर शास्त्रीय गायिका मृदुला श्रीवास्तव ने शायर गुलरेज़ इलाहाबादीकी ग़ज़ल  'दर परदा चाहतों का कोई सिलसिला तो है / पत्थर समझ के कोइ मुझे पूजता तो है' पेश की तो श्रोताओं ने करतल ध्वनि की झड़ी लगा दी। से.नि. ग्रुप कैप्टेन श्यामल सिन्हा गुड़गांव ने डॉ. विष्णु सक्सेना अलीगढ की ग़ज़ल 'रेत पर नाम लिखने से क्या फायदा / एक आई लहर कुछ बचेगा नहीं' गाकर वाहवाही पाई। संस्कृत साहित्य की पुरोधा डॉ. सुमनलता श्रीवास्तव ने अभिराज राजेंद्र मिश्रा की गलज्जलिकाओं  (संस्कृत ग़ज़ल) का पठन करते हुए उन्हें अन्तर्निहित छंद और बहर का उल्लेख किया। से. नि. अरुण भटनागर ने आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' रचित बुंदेली ग़ज़ल "बखत बदल गओ आँख चुरा रए / सगे पीठ मा भौंक छुरा रए " सुनाकर सामाजिक विसंगतियों पर प्रहार किया। 

प्रख्यात भाषाविद डॉ. सुरेश कुमार ने राज नारायण राज की ग़ज़ल ''क्या बात थी कि जो भी सुना अनसुना हुआ / दिल के नगर में शोर में था कैसा मचा हुआ'' का वाचन कर श्रोताओ को मंत्र मुग्ध कर दिया। डॉ भावना दीक्षित ने आदिल राजा मंसूरी की ग़ज़ल 'दिन के सीने पर शाम का पत्थर / एक पत्थर पे दूसरा पत्थर'  सुनाई। आज के मुखिया इंजी सलीम अंसारी ने १६ दीवानों के रचयिता अन्तर्राष्ट्रीय शायर खुशबीर सिंह ''शाद'' जालंधर की ग़ज़ल ''आईने में पहले एक चेहरा हुआ करता था मैं / ये मुझे क्या हो गया है,  क्या हुआ करता था मैं'' पेश करते हुए इसे ग़ज़ल का आधुनिक चेहरा बताया। आज के पाहुने मरू गुलशन पत्रिका के संपादक अनिल अनवर जोधपुर ने मिर्ज़ा ग़ालिब की ग़ज़ल ''रहिए अब ऐसी जगह चलकर जहाँ कोई न हो / हमसफ़र कोई न हो और हमजुबां कोई न हो'' पेश कर एक-एक शेर को ख़ूबसूरती से पेश किया। 

लखनऊ के शायरे आजम कृष्ण बिहारी नूर के शागिर्दे ख़ास इंजी। देवकीनंदन 'शांत' ने   ''ज़िन्दगी से बड़ी सजा ही नहीं / और क्या जुर्म है पता ही नहीं' सुनाकर महफ़िल लूट ली। सपना सराफ ने गुलज़ार जी की लिखी नज़्म 'मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है'' पेश की। डॉ. आलोक रंजन पलामू ने अंगद किशोर की ग़ज़ल प्रस्तुत की। युवा सारांश गौतम ने रामराज फ़ौज़दार 'फ़ौजी' की ग़ज़ल 'मेरा दिल मुझसे वो गुजरे हुए मौसम चाहे / गुम हुए दोस्त और बिछुड़े हुए हमदम चाहे'' प्रस्तुत कर शाबाशी पाई।  दिल्ली से तशरीफ़ लाई सुषमा शैली ने खलील धनतेरवी जी की ग़ज़ल 'अब मैं राशन की कतारों में नज़र आता हूँ / अपने खेतों से बिछुड़ने की सजा पाता हूँ'' पेश कर ग़ज़ल का यथार्थवादी चेहरा उजागर किया। जबलपुर के हर दिल अज़ीज़ शायर यूनुस अदीब ने अपने उस्ताद  ''तुम आज सुन रहे हो की इंसान मर गया / इस हादसे को एक जमाना गुजर गया'' साबिर जबलपुरी का कलाम पढ़कर महफ़िल से शाबाशी पाई। चबल की वादी में भिंड से आई मनोरमा जैन 'पाखी' ने शकील बदायूँनी  की ग़ज़ल 'मेरी ज़िन्दगी पे न मुस्कुरा, मुझे ज़िंदगी का अलम नहीं' प्रस्तुत की।  पाहुने अनिल अनवर जी ने आयोजन की गुणवत्ता और स्तर की सराहना करते हुए लोकडाउन समापन की कामना करते हुआ सामान्य और सुरक्षित जीवन की कामना की। मुखिया की आसंदी से शायर इंजी सलीम अंसारी ने आज के आयोजन में हिंदी-उर्दू के साथ संस्कृत, अंग्रेजी और बुंदेली में ग़ज़ल प्रस्तुति को ऐतिहासिक निरूपित करते हुए ऐसे प्रयासों की निरंतरता प्रतिपादित की। प्रो. आलोकरंजन द्वारा आभार प्रदर्शन के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।

 

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