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विश्ववाणी हिंदी संस्थान का ऑनलाइन अलंकार पर्व 
May 28, 2020 • पुनिता भारद्वाज • समाचार
जबलपुर, । एक नयी परंपरा का सूत्रपात करते हुए हिंदी काव्य के विविध अलंकारों पर एक संगोष्ठी का आयोजन विश्ववाणी हिंदी संस्थान जबलपुर के तत्वावधान में किया गया। इस संगोष्ठी में 25 वक्ताओं ने हिंदी के विविध अलंकारों के लक्षणों-उदाहरणों, हिंदी तथा विविध बोलिओं बुंदेली, बघेली, छत्तीसगढ़ी, भोजपुरी, उर्दू, राजस्थानी आदि के साथ अंग्रेजी काव्य में अलंकार-प्रयोग  परंपरा का उल्लेख किया। आरम्भ में विघ्नेश्वर तथा वीणापाणी की वंदना, मुखिया छाया त्रिवेदी बाल शिक्षाविद, पाहुना मनोरमा रतले दमोह तथा संयोजन आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' का स्वागत किया गया। मीनाक्षी शर्मा 'तारिका' ने सुमधुर स्वर में सरस्वती वंदना प्रस्तुत करते हुए आचार्य संजीव वर्मा रचित आलंकारिक दोहों का पाठ किया जिनमें अनेक अलंकारों को इस तरह गूँथा गया है जैसे माला में मोती पिरोये गए हैं- 
'दे वर' देवर से कहा, कहा 'बंधु मत माँग,/तू ही चलकर भरा ले, माँग पूर्ण हो माँग
विशेष अतिथि आचार्य कृष्णकांत चतुर्वेदी पूर्व अध्यक्ष कालिदास पीठ उज्जैन ने इस प्रयोग को प्रथमत: किया गया महत्वपूर्ण प्रयोग बताते हुए भूरी-भूरी सराहना की। आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' ने विषय प्रवर्तन करते हुए संस्कृत पिंगलाचार्यों द्वारा अलंकार सम्प्रदाय में व्यक्त विचारों तथा हिंदी में अलंकारों के वर्गीकरण व् प्रकारों पर प्रकाश डाला और अलंकारों से अलंकृत दोहे पढ़कर सराहना पाई। सिरोही से पधारे वरिष्ठ साहित्यकार छगनलाल गर्ग ने ''राजस्थान काव्य में अलंकार''डिंगल काव्य परंपरा में नीति संबंधी दोहों और वीर काव्य में अलंकारों के उदहारण दिए तथा कृपाशंकर बारठ  द्वारा सेवक राजियो को संबोधित सोरठों का उल्लेख किया। छाया सक्सेना ने बघेली काव्य परंपरा में अलंकारों की चर्चा करते हुए शब्दालंकारों -अर्थालंकारों के उदाहरण दिए - ''के खे तारिअ महतारिअस, तारिअ होय कहाँ से / महतारी है जबर बिस्वा में, अउर सबई जहां से'' । रायपुर छत्तीसगढ़ से पधारी रजनी शर्मा ने छत्तीसगढ़ी के पुरोधा सुंदरलाल शर्मा का पुण्य स्मरण करते हुए छत्तीसगढ़ी काव्य में अलंकारों के उदहारण प्रस्तुत किये " हमर कत का सुन्दर गाँव जैसे लछमी के पाँव'' । ख्यात शायर यूनुस अदीब ने उर्दू अदब में अलंकार को खूबसूरती निखारनेवाला तत्व बताते हुए अदबी अस्नाफ व् इज़ाफ़तों का ज़िक्र किया तथा साबिर जबलपुरी का शेर सुनाया ''उस बेवफा ने मुझे सताने के वास्ते / दिल का दिया दिया भी तो जलता दिया दिया''। दिल्ली से आई डॉ. संगीता शर्मा अधिकारी ने रीतिकाल के महाकवि रहीम का दोहा ''खैर खून खाँसी खुशी, बैर प्रीति मदपान / रहिमन दाबे न दबे, जाने सकल जहान'' प्रस्तुत किया। 
कासगंज उत्तर प्रदेश से सम्मिलित हुए अखिलेश सक्सेना जी ने काव्य में अलंकारों के महत्व को बताते हुए उसकी अतिशयता से बचकर स्वाभाविकता से अपनाने की सलाह दी। नल-दमयंती की नगरी दमोह से प्रतिनिधित्व कर रहे डॉ. अनिल जैन विभागाध्यक्ष अंग्रेजी ने स्पेंसरियन स्टेंज़ा और मेटाफर अलंकार पर चर्चा करते हुए उसके उदाहरण दिए। किसी गोष्ठी में पहली बार उर्दू अंग्रेजी साहित्य में अलंकार परंपरा की चर्चा हुई। प्र्रीति शर्मा ने विरोधाभास अलंकार तथा संदेह अलंकार के उदाहरण देते हुए उनके अंतर को स्पष्ट किया। सिद्धेश्वरी सराफ ने छेकानुप्रास अलंकार की चर्चा की। भिंड से पधारी मनोरमा जैन 'पाखी' ने उत्प्रेक्षा अलंकार का रथ जी देख रहे हैं उसे कल्पना से अधिक बढ़ा-चढ़ाकर देखना बताया। पुनीता भारद्वाज भीलवाड़ा ने अलंकार को भावोत्कर्षकारी बताया। मनोरमा रतले दमोह ने भ्रांतिमान अलंकार और संदेह अलंकार में सूक्ष्म अंतर बताते हुए उदाहरण दिया "ओस बिंदु चुग रही हंसिनी, उनको मोती जान' । सपना सराफ ने वृत्यानुप्रास पर प्रकाश डाला।   
मीनाक्षी शर्मा 'तारिका' ने श्रुत्यानुप्रास की चर्चा करते हुए एक ही स्थान से उच्चरित वर्णों के प्रयोग के उदाहरण दिए। भारती नरेश पाराशर ने लाटानुप्रास को परिभाषित करते हुए उसे शब्द  की वृत्ति होने पर अर्थ में भिन्नता को लक्षण बताया। इंजी अरुण भटनागर ने श्लेष अलंकार  की परिभाषा 'एक शब्द के एक प्रयोग से एकाधिक अर्थ निकलना' बताते हुए उदाहरण दिए- 'जो रहीम गति दीप की, कुल कपूत गति सोय / बारो उजियारो करे, बड़े अंधेरो होय'। उपमा अलंकार की जानकारी देते हुए रमन श्रीवास्तव ने तरनि तनुजा तट तमाल तरुवर बहु छाए' को शब्दालंकार तथा सिंधु सा विस्तृत और अथाह, एक निर्वासित का उत्साह को अर्थालंकार बताया। उन्होंने उपमा अलंकार को परिभाषित करते हुए 'सीता का मुख चन्द्रमा के समान सुंदर है, उदाहरण दिया। बाल शिक्षाविद छाया त्रिवेदी ने 'बालकाव्य में अलंकार' विषय पर सारगर्भित विचार व्यक्त किए। डॉ मुकुल तिवारी ने अन्त्यानुप्रास अलंकार पर प्रकाश डाला। डॉ. आलोकरंजन ने भोजपुरी  काव्य में अलंकार का परिचय कराया। 
वीना श्रीवास्तव रांची ने अलंकार और संगीत के अंर्तसंबंध की चर्चा की। चंदा देवी स्वर्णकार ने रूपक अलंकार पर चर्चा कर उदाहरणों का विश्लेषण किया। बबीता चौबे दमोह ने 'स्मरण अलंकार' को इससे उसकी याद बताया। अध्यक्षीय संबोधन में छाया त्रिवेदी जी ने 'अलंकार तत्व' को अभिनव आयोजन बताया। कार्यक्रम में सटीक उद्घोषणाएँ कर रही डॉ. मुकुल तिवारी का समयानुशासन सराहनीय रहा। 
 

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