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विष्णु प्रिए!
April 27, 2020 • डॉ.मनोहर अभय • कविता

*डॉ.मनोहर अभय

विष्णु प्रिए!
कब तक पैताने बैठ कर
चरण दबाती रहोगी
जनार्दन के
जीवों के पालनहार से कहो
संहार हो रहा है जीवों का
चारों- ओर
चुनौती दे रहे हैं
मृत्यु के आयुध
हवाएँ बाँट रही हैं विषैला रसायन
घटाओं से बरस रहे हैं विषाणु
गरुड़ पर आरूढ़ हो
एक बार तो देख आते
कैसे बाघम्बर पहने
जावड़ा फाड़ रहा है आदमी
- आदमी का
सागर सुते !
हिलोरें मार रहा है क्षीरसिंधु
और छटपटा रहे हैं
माँ की सूखी छाती से चिपटे
सहस्र- सहस्र नवजात--
एक बूँद दूध के लिए
कर दो सारा क्षीरसागर
दुधमुँहे बच्चों के नाम
ऐश्वर्यमयी !
तुम्हारे समूचे ऐश्वर्य को
चबाए जा रहा है
कुबेर
खोल दिए हैं कोषागार
श्रीमंतों के लिए
खाली हाथ वाले
लौट रहे हैं खाली हाथ
मैले हो रहे हैं निरंतर
तुम्हारे रत्नाभरण
मंगल सूत्र के लिए
रुके पड़े हैं कन्याओं के
--- कन्यादान
श्रीपदे !हे पद्मे !!
तुम ब्रह्माण्ड की सब से समृद्ध -
सामर्थ्यवान महिला हो
जानती हो कितनी महिलाएँ
दुःख- दारिद्र्य के
महाचक्र में पिस रही हैं
-यंत्रणाओं की जंजीरों में जकड़ी
क्यों नहीं
तोड़ देतीं इनकी बेड़ियाँ
कि खुल कर चल सकें
समरसता की जमीन पर
मस्तक ऊँचा किए
छोड़ो पैताने बैठ कर
जनार्दन के पैर दबाना
कुछ ऐसा करो कि
हम पूजते रहें तुम्हें
सालों- साल
खील-बतासे और
चाँदी के सिक्के से
कि छप्पर फाड् कर
बरसे चांदी झुपड़ियों पर|

*डॉ.मनोहर अभय ,नवी मुम्बई

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