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वनवासियों का लोकाचार संविधान से ज्यादा सशक्त है
June 18, 2020 • डॉ सीमा शाहजी • लेख

*डॉ सीमा शाहजी

भारत की आदि जातियों में से एक मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले के आदिवासियों के साहित्य के बारे में जानना समझना, उनके साक्षात्कार की प्रक्रिया कहीं न कहीं हमें अपनी ही संस्कृति की जड़ों तक ले जाती है। इस जाति के पास अपना जो गौरव है वह दरअसल हमारी ही संस्कृति का आदिम गौरव है। हमारी ही अपनी धरोहर को इस जनजाति में तमाम कष्टों उठाकर सहेज कर रखा है। कचना की पूरी की पूरी जनजाति सदियों तक वनों के उन अंधेरों में घूम रही जहां ना तो सूर्य और ना ही विकास की कोई कोमल सी रश्मि पहुंच जाती।

जनजाति को क्यों वनों में जाना पड़ा ऐसे वन जहां से लौटकर राम तो राजा बन गए परंतु स्वयं को राम से जुड़ा मानने वाले उनके ही अनुयाई सदियों तक फिर कभी नहीं लौट पाए, वे लौटे तो नहीं लेकिन उनका अपना लोकाचार आज भी किसी विकसित राष्ट्र के संविधान से ज्यादा प्रभावी एवं परिणाम देने वाला है। देश के संविधान की रचना को पिछले 70 वर्षों में पहले हुई किंतु समाज के लिए लोकाचार के रूप में संविधान का निर्माण इस जनजाति ने हजारों वर्ष पूर्व ही कर लिया था। मनुष्य का जीवन कैसा हो वह समाज में किस प्रकार करें उसके विवाह एवं अन्य सामाजिक प्रक्रिया कैसी हो इन सब पर हजारों वर्षों पहले से तत्कालीन लोक साहित्यकारों और समाज शास्त्रियो ने विचार किया था। समाज के संविधान के निर्माता भी गिरीकंद राहों में ही रहने वाले थे, जिन्होंने मनु स्मृति का प्राणाया ना किया मनुस्मृति भारतीय समाज के सामाजिक नियमों का प्रथम एवं सर्वमान्य संग्रह है वनों में देश की लगभग 70% जनता निवास करती है। इन व नेचर जातियों के अपने सामाजिक नियम रहे हैं विशिष्ट संस्कृति रही है और वही संस्कृति लोक संस्कृति के रूप में प्रतिष्ठित है पुरातन संस्कृति का झंडा बरदार बनकर नवीन समाज के सामने बेझिझक मोड में जो जातियां अभी भी अपनी आंतरिक उर्जा के कारण खड़ी है।

हम पाते हैं कि उसने आदिवासी भील जनजाति प्रमुख है देश के मानचित्र में भले ही जाति को इधर-उधर धकेल कर काफी कम स्पेस पर लाकर सिकुड़ दिया हो परंतु उसके अस्तित्व को तो मिटाया नहीं जा सका है इस जनजाति के पास गौरव करने के लिए अपना ही जीवन अपना ही पुरुषार्थ अपना ही साहित्य है बस लेकिन यह भी इतना प्रखर रहा है कि हमारे आदि ग्रंथ धर्म ग्रंथ इन्हें कभी नकार नहीं पाए इनकी साहित्यिक परंपरा को अगर वाल्मीकि के गद्य एवं शबरी के भजन मिले हैं तो कालांतर में जाते-जाते यह पूंजी भी राम के सृष्टि वर्ग की धरोहर बन गई आदिम जाति में जो भी श्रेष्ठ हुआ उसे या तो हथिया लिया गया या उसकी भ्रूण हत्या कर दी गई तत्कालीन व्यवस्थाओं में ऐसा करने की आजादी थी वर्ग विशेष को मिली हुई थी शायद यही वजह थी की इस परंपरा के साहित्य में या तो विद्रोह की भाषा मिलती है या अनु नाई या अभ्यर्थना जब की आवाज ना तो विद्रोही रहा और ना ही अनु नहीं करने वाली गुलाम मानसिकता का शिकार रहा पर यह विडंबना ही थी कि इस वर्ग से हूं थोड़ा ऊंचा वही उठ सका जिसने या तो विद्रोह किया या विनय यदा-कदा इस साहित्य संपदा को आदिम संस्कृति व संस्कार के खजाने पर अधिकार पूर्वक सामने आता है जबकि यही तो वह संस्कृति है जिसने इन मूल्यों को अभी तक बचा कर रखा है इस जनजाति की संस्कृति परंपरा  समृद्ध उतार मैत्रीपूर्ण एवं व्यापकता के साथ सामने आती है यह सांस्कृतिक परंपरा किसी अन्य परंपरा पर अतिक्रमण नहीं करती ना ही अन्य को ओवरलैपिंग करती है ।

यह तो किसी पवित्र सरोवर की निर्मल धारा के समान बहती है उसे अपने प्रभाव क्षेत्र में आने वाली भीषण से भीषण गंदगी से कोई परहेज नहीं यह उसे भी अपने साथ अपनी यात्रा में शामिल कर लेती है उसके पुरातन पर्वों में आधुनिक शराब कब शामिल हो गई उसे भी नहीं पता इसी तरह उसने अन्य संस्कृति की अच्छाइयों को भी स्वीकार कर लिया शिक्षा एवं वेशभूषा में परिवर्तन इसके उदाहरण है वाल्मीकि के इन वचनों में राम के भक्त होने के बावजूद तुलसी वह स्थान नहीं बना पाए जो तुलसी के समकालीन भक्त कबीर बना गए स्वयं को कबीरपंथी मानने से भी आगे जाकर इस वर्ग ने अपनापन ही उनके नाम से बना लिया कबीर के माध्यम से ही भगत बनाम भक्तों की यात्रा तय करता है क्या कोई और संस्कृति पूर्णकालिक गृहस्थ को इस तरह भक्त पंथी बनाती है जहां अन्य वर्गों ने मानव को ही भगवान बनाने की टकसाली विकसित कर ली हो वहां यह संस्कृति स्वयं को मानव से भी ऊंचा बनाए रखने में भी विद्रोह नहीं करती राम के राजा होने से वनवासी होने तक सब की व्यथा रोहित जीता है परंतु वनवासी से पूनम राजा होने की महत्वाकांक्षा वह कभी नहीं पाता राज्य कब इस संस्कृति के हाथों से फिसल जाता है और जंगली होने का तमगा इसके सीने पर लगा दिया जाता है शायद वह भी नहीं जानता कई विशेषताओ को समेटे यह लोक संस्क्रति अपनी यात्रा तो कर रही है  पर अब इस यात्रा को विश्राम या वन की नही , मंजिल की आवश्यकता है।

आज पूरा देश कोरोना महामारी से जूझ रहा है राहत की बात यह है की ग्रामीण क्षेत्र बहुत हद तक इससे बचा हुआ है कोरोना संक्रमण से बचाव के लिए आज हाथ मिलाने के स्थान पर नमस्कार करना और सुरक्षित शारीरिक दूरी बनाए रखने की बात को माना जा रहा ही ,जबकि आदिवासी अंचल की जीवन शैली में यह बातें पूर्व से ही प्रचलित हैं। जनजातीय समाज फलिया पद्धति से बने दूर-दूर घरों में रहते हैं अभिवादन के लिए हाथ मिलाने की परंपरा कभी नहीं रही बल्कि राम-राम से ही अभिवादन किया जाता है रहने वाले यह लोग फेसबुक ठंड और बारिश को सहन करते हैं जिससे इनकी इम्यूनिटी अर्थात रोग प्रतिरोधक क्षमता बेहतर होती है फिर भी कुछ क्षेत्रों में ग्रामीण युवा अभी भी निर्बाध रूप से मोटरसाइकिल पर निर्बाध रूप से आवाजाही कर रहे हैं महा उन्हें उन्हीं की भाषा में समझाइश दी जाती है कुछ इस तरह कि- 
जीवता रेहो तो घणा विवा करहो/कोरोना नी बेमारी ने न्हाड़ी ने जब्बर मजो लेहो  अर्थात  जिंदा रहोगे तो खूब शादियां करना और कोरोना को दूर भगाकर खूब मज़े करोगे 
राम राम करो भाया मलावो मत्ति हाथ विदेसी बेमारी नहाटी झायगा तमू घ्रर ने राखो साफ  अर्थात  राम राम करो हाथ मत मिलाओ घर को साफ रखो ओर विदेशी बीमारी को दूर भगाओ 
भेला नी थावो ,दुकाना बंद राखजो ,होशियारी मत बटाडो बाजार मा मत फरो ।सरीर दुखे माथो दुखे खासी साले तो इसप्ताल  में बताड़जो म्हारा भाया ने ध्यान राखजो  इस प्रकार आंचलिक भाषा मे  ग्रामीणों को जागरूक किया जा रहा है ।
*थांदला जिला झाबुआ मप्र
(लेखिका लोक जीवन की जानकार है) 
 

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