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October 8, 2020 • ✍️शशि पाठक • कविता

✍️शशि पाठक
कोसती थी मैं कभी
गांव की कच्ची सड़क को
जो ले गई मेरे लाल को
रोटी की तलाश में
मुझ से दूर !
लेकिन अब नहीं !
इसी सड़क पर चल कर
लौट आया है वो मेरे पास
क्या हुआ जो
लुटा पिटा सा है
टूटा फूटा सा है !
मैं भर दूंगी उसका मन
स्नेह और ममता से
और भर दूंगी
हर ज़ख्म
जो लगाया उसे ज़माने ने !
छिपा लूंगी उसे मैं
अपने आंचल में
हर चिन्ता से परे !
कम खा लेंगे पर
साथ तो रहें गे !
अब न जाने दूंगी मैं उसे
आंखों से दूर !

*जयपुर

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