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उठे उसे पर उंगलियां अगर
June 7, 2020 • अंजनी कुमार • कविता

*अंजनी कुमार

वह जागता है सीमाओं पर 
इसलिए मैं घर पर सो पाता हूँ
उठे उसे पर उंगलियां अगर 
फिर कैसे मैं चुप रह जाता हूँ?
मैं अपनों से जुझ तक नहीं पाता 
और वह अनजानों से लड़ लेता है
न धूप की गर्मी उसे कभी सताए
हर तूफान भी वह हंस कर सह लेता है
मैं प्यास बुझाऊं शीतल पेय और मदिरा से
और वहां वो सदा खून का प्यासा रहता है
हर सुबह शाम कैसे बिना उसकी फिक्र किए
मैं अपनो संग चाय-काफी पी लेता हूँ
वह जागता है सीमाओं पर 
इसलिए मैं घर पर सो पाता हूँ
उठे उस पर उंगलियां अगर 
फिर कैसे मैं चुप रह जाता हूँ?
परिवार संग रहकर भी, 
हैरान-परेशान रहता हूँ मैं
और वह अपनो की यादों में खो कर भी
पूरी इमानदारी से अपना फर्ज निभाता है
मर्दानगी दिखाता है वह सीमा पर अक्सर
मैं केवल मर्द पुकारा जाता हूँ
उस सच्चे देशभक्त की फिक्र किए बिना
कैसे मैं सो जाता हूँ
वह जागता है सीमाओं पर 
इसलिए मैं घर पर सो पाता हूँ
उठे उस पर उंगलियां अगर 
फिर कैसे मैं चुप रह जाता हूँ?
*जमशेदपुर, झारखण्ड
 

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