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उस को छूकर भी तो नहीं छुआ मैंने
May 25, 2020 • सुरजीत मान जलईया सिंह  • कविता

*सुरजीत मान जलईया सिंह 

उस को छूकर भी तो नहीं छुआ मैंने।
इसी प्यास में दरिया नहीं छुआ मैंने।
 
जलता हुआ बदन भी छूकर देखा है। 
सचमुच वैसा कुछ भी नहीं छुआ मैंने।
 
सन्नाटा सा उतर गया है भीतर तक।
अपने बाहर क्या क्या नहीं छुआ मैंने?
 
जुदा न उसकी ख़ुशबू मुझसे हो जाए।
उसको छूकर खुद को नहीं छुआ मैंने।
 
मेरे अन्दर अब तक उसकी हलचल है।
कई वर्षेो से जिसको नहीं छुआ मैंने।
*दुलियाजान, असम
 
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