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उद्बोधन
January 10, 2020 • डॉ साधना गुप्ता • कविता

*डॉ साधना गुप्ता

उठो,जागो ,रुको नहीं,जब तक लक्ष्य मिले नहीं,
निर्बल करे जो तुम्हें,- शरीर, मन,धर्म से ,
तज दो उसे सहर्ष तुम,हलाहल समझ के ,
हो गर विश्वास स्वयं पर,तब ईश स्वतः मिल जाएंगे,
उठो,जागो,रुको नहीं,जब तक लक्ष्य मिले नहीं,
उच्च हो आदर्श संग,भाव-विचार मनन भी मस्तिष्क में,
कर्म करो महनीय,तुम महनीय ही बन जाओगे,
भूलो न हितकर्ता को ,कृतज्ञता स्वीकार करो,
उठो,जागो,रुको नहीं, जब तक लक्ष्य मिले नहीं,
प्रियजन से करो ना तुम घृणा,नेहमय व्यवहार हो,
करे भरोसा जो तुम पर,उनका विश्वास ना तजो,
अध्ययन में एकाग्रता,एकाग्रता में ध्यान धरो,
ध्यान संग संयम रहे, स्व से बात सम्भव बने,
यह है उदबोधन, स्वनाम धन्य विवेकानन्द का,
उठो,जागो,रुको नहीं, जब तक लक्ष्य मिले नहीं।
 
*डॉ साधना गुप्ता

मंगलपुरा, झालवाड़ 326001 राजस्थान

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