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तेरा-मेरा प्यार
November 12, 2019 • अंकुर सहाय 'अंकुर' • दोहा/छंद/हायकु

*अंकुर सहाय 'अंकुर'*

 जीवन भर नर्तन किया, फिर ली आंखें मूँद ।
 गर्म तवे पर नाचती, ज्यों छन-छन-छन बूँद ।।
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'अंकुर'! मन के कुम्भ में, डाल प्रेम का इत्र ।
 पीकर  महके मित्र बन, सारे शत्रु विचित्र ।।
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रंच नहीं कटुता कहीं ,ऐसा हो संसार  ।
 तब भव - सागर पार हो, तेरा-मेरा प्यार  ।।
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आप सभी से पूछिए, मिलकर उनका क्षेम ।
जन गण मन में 'आपके', प्रति बस जाए प्रेम  ।
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काम-क्रोध-मद-लोभ ही, है जिसका आधार।
कभी नहीं मिलता उसे, रघुनन्दन का  प्यार।।
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पछताएं मत आप अब, करें हाथ से सैर ।
 वक़्त भागता जा रहा , सर पर रखकर पैर।।
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चुहिया भी निकली नहीं, खोदे खूब पहाड़।
ताड़ प्रश्न; हल तिल नहीं, तिल बन बैठा  ताड़।।
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तन पर तम छा जाय पर, बुझे न मन का दीप।
मन है मोती प्रेम का, तन है उसका सीप।।
 
*अंकुर सहाय "अंकुर,
ग्राम -खजुरी, पत्रालय- खजुरी 
वाया-अहरौला, तहसील- बूढ़नपुर
जिला- आज़मगढ़
मोबाइल नम्बर- 9454799898
 

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