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तमाशा खुद ना बन जाना तमाशा देखने वाले
April 18, 2020 • व्यग्र पाण्डे • लेख

  *व्यग्र पाण्डे

तमाशा देखने की प्रवृत्ति मानव स्वभाव में आज की नहीं बल्कि आदि काल से चली आ रही है। मुझे आज भी याद है बचपन में जब गाँव में, चाहे सपेरे द्वारा सांप का खेल हो ,बंदर-बंदरिया का खेल हो, रीछ का खेल या फिर जादूगर और जमूरा का खेल हो । ये सब उस जमाने के पसंदीदा खेल-तमाशों की श्रेणी में आते थे। जैसे ही डम-डमी बजी अर्थात डमरू के बजने की आवाज आई हर उम्र के स्त्री-पुरुष अपने-अपने काम छोड़ कर खींचे चले आते विशेष कर बच्चों के लिए ये अधिक रुचिकर हुआ करता था। यूँ तो ये तमाशे ये खेल आम इंसानों को मनोरंजन का माध्यम हुआ करते थे पर कई जातियों के पेट पालन का जरिया भी थे ये खेल।

कई बार जादूगर अपने जमूरे की तबियत का बहाना बनाकर दर्शकों में से जमूरा बनने के लिए  आमंत्रित करता और तमाशा देखने वालों में से कोई ना कोई जमूरा बन ही जाता पर बाद में वह अपनों के बीच अपने इस निर्णय पर मन ही मन पछताता और अब कभी ना बनने की कसम खाता पर जादूगर को हर बार कोई दूसरा जमूरा मिल ही जाता था ।

याद आया एक बार गाँव में नाटक मंडली आई पता चला कि आज चौक में 'रूप-बसंत' का नाटक दिखाने वाली है । पूरा गाँव सांझ होते ही चौक में इकट्ठा होना शुरु हो गये थे। नाटक के बीच में गीत-गाने, नाच-कूद भी हुआ करते थे और दर्शक अपनी पसंद के गीतों की फ़रमाइश रुपये देकर करते, इसी प्रकार दूसरों की फ़रमाइश को रुपये देकर हटा भी देते ऐसा चलन भी था । उस दिन सुबह तीन बजे तक नाटक का कार्यक्रम चला । सुबह-सुबह मेरे पड़ोस में आपस की तू तू मैं मैं की आवाज आने लगी पता चला कि पड़ोस के भैया-भाभी लड़ रहे हैं रात को नाटक में भैया, अपनी कठोर मेहनत से कमाये रुपये गीत-गानों में दे आये थे जो घर की जरूरतों के लिए रख रखे थे।

समय बदला मनोरंजन के साधन बदले पर मनुष्य की प्रवृत्ति नहीं बदली । इस मोबाइल के युग ने तो मनोरंजन के मायने ही बदल दिए । नये-नये खेल तमाशों का ईजाद हुआ और आज का आदमी उनमें भी पूर्णरूपेण फंसता चला गया । अचानक कोरोना की बीमारी ऐसी आ गयी कि लोगों को लॉक डाउन के अंतर्गत घर में ही रहना पड़ रहा है कुछ दिन तो मोबाइल ने पास किए पर अब वो भी मनोरंजन करने में असमर्थ सा दिखने लगा। खबरों में आने लगी लोग बिना काम सड़कों पर घूम रहे हैं समझाने पर भी नहीं मान रहे । इसी क्रम में मेरे कुछ परिचित भी तमाशा देखने की प्रवृत्ति से ग्रसित हो गये और मोटरसाइकिल उठा शहर का मुआयना करने निकल पड़े और पुलिस की चपेट में आ गए। उनकी मोटरसाइकिलें ज़ब्त कर ली और उन्हें मुर्गा बनाया साथ ही बिना काम सड़कों पर घूमने की हिदायत पुलिस के डंडे ने भी बखूबी दी बात यहाँ ही खत्म नहीं हुई उसी दिन किसी ने उनका ये वीडियो भी डाल दिया कुछ कसर बाकी रही वो अगले दिन के अखबारों ने पूरी कर दी । उन समझदारों का लॉक डाउन सरकार के लॉक डाउन से अधिक चलेगा ऐसा लगता है पर वो भी क्या करे उन्हें तो जन्मजात संस्कार खींच कर ले गए थे खैर... मुझे इस घटनाक्रम से उन पर तरस भी आया और याद आई उर्दू के किसी शायर की ये पंक्ति ... "तमाशा खुद ना बन जाना तमाशा देखने वाले "   

*व्यग्र पाण्डे,गंगापुर सिटी, सवाई माधोपुर

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