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स्वाभिमान की रोटी
June 19, 2020 • दिव्यांश जोशी • कहानी/लघुकथा
*दिव्यांश जोशी
‌उसे कहाँ पता था कि उसके हाथ से वो खिलौना भी छीन जाएगा जिसके साथ उसने पूरा बचपन गुज़ारा। "लकड़ी की छोटी सी बैलगाड़ी, और दो छोटे छोटे बैल" चिन्मय के पिताजी की मौत को अभी दो साल ही हुए थे कि उनकी माँ भी गुज़र गई और पैसों की तंगी के कारण उसे घर का सारा सामान और अपनी झोपड़ी भी बेचनी पड़ी, तब जा कर वह अपनी माँ का अंतिम संस्कार कर पाया। अब चिन्मय बिल्कुल अकेला सा रह गया, माँ की सेवा में ही दिन भर लगे रहने के कारण अभी तक उसने कोई दोस्त भी नही बनाया था। फुटपाथ पर ज़िन्दगी के एक एक पल को गुज़रता रहा और एक ही बता हमेशा सोचता रहा क्या सबकी ज़िन्दगी ऐसी ही होती हैं, नही नही सबकी तो ऐसी नही होती होगी। उस साहूकार ही ज़िन्दगी कितनी बढ़िया हैं आलीशान घर, नोकर चाकर बड़ी सी मोटर गाड़ी और खाने में हर रोज़ नये नये पकवान । बस यही सोचते सोचते आधी भूख को पेट मे छुपाये हुए चिन्मय ज़मीन पर सो गया। जब सुबह की पहली किरण और फुटपाथ की आवाजाही ने चिन्मय की नींद को जगा दिया तब निकल पड़ा दिन के भोजन की तलाश में। रास्ते मे कई सारे लोग दिखे कुछ बिल्कुल उसी की तरह थे और कुछ बिल्कुल उस साहूकार की तरह। आगे जा कर चिन्मय एक होटल में गया। वहाँ जा कर उसके मन मे आया कि कुछ मांग कर खा लू पर उसे अपने पिता की एक बात याद आयी उन्होंने कहा था कि बेटा कुछ दिन भूखा रह जाना लेकिन माँग कर कुछ मत खाना हो सके तो भोजन कमा लेना, बस यही बात चिन्मय के मन मे विराजमान थी उसने कुछ नही मांगा वो सीधा वहाँ गया जहाँ होटल का मैनेजर बैठा था। चिन्मय 9 साल का एक छोटा अनाथ बच्चा था जो साफसुथरा भी नही दिख रहा था, मैनेजर ने चिन्मय को अपनी और आते देख अपने नोकर से कहा कि इसे कुछ खाने का दे कर भगाओ यहाँ से। नोकर अपने हाथ मे एक पुड़िया में कुछ खाने का ले कर चिन्मय को देने लगा और कहने लगा कि अब जाओ यहाँ से, ना जाने कहा कहा से आ जाते हैं सवेरे सवेरे, चिन्मय ने पुड़िया नही ली और चिल्ला कर बोला कि खाना मांगने नही आया हूं खाना कमाना चाहता हूं। शायद ये बात वहाँ के मैनेजर ने सुन ली और उठ कर चिन्मय की और बढ़ने लगा। चिन्मय थोड़ा डर गया कि कहि मुझे मेरी गुस्ताख की सज़ा ना मिल जाये लेकिन यहाँ कुछ उल्टा ही हुआ मैनेजर ने चिन्मय के कंधे पर हाथ रखा और अपने डेस्क तक ले गया। चिन्मय के मन में डर और खुशी दोनो एक साथ प्रवेश कर रही थी। भारी सी आवाज़ में मैनेजर ने कहा कि बेटा तुम क्या काम करना चाहते हो?, मासूम हल्की सी मुस्कान लिए चिन्मय बोला कि जिस काम के करने से मैं पेट भर कर खा सकू, वो काम करना चाहता हूँ। धीरे धीरे चिन्मय के बारे में बातचीत के द्वारा मैनेजर ने सब कुछ जान लिया उसके माता पिता के बारे में भी जान लिया और उसने चिन्मय को एक छोटा सा काम दिया, वो काम था जो भी व्यक्ति होटल में आये उनका स्वागतं करना और उनसे कहना कि आइये आपका हमारी होटल में स्वागतं है। इस काम के बदले मैनेजर ने चिन्मय को दो वक्त का खाना और होटल में ही रहने की व्यवस्था कर दी। चिन्मय खुश था और मन लगा कर काम कर रहा था, मैनेजर भी उसे कभी कभी अच्छे काम के लिए इनाम दे देता था। अब चिन्मय के मन में वो बात नही आती थी कि क्या सभी की ज़िंदगी ऐसी ही है, वो समझ चुका था कि भगवान ने सबकी अपने हिसाब से अलग अलग व्यवस्था कर रखी हैं। दिन गुज़रते गए और चिन्मय वही बड़ा होता गया। धीरे धीरे उसने पूरी होटल का काम संभाल लिया था और मैनेजर का विश्वास जीत लिया था। और हमेशा कहता रहता था कि "स्वाभिमान की रोटी, बहोत स्वादिष्ट होती".
*सुरवानिया, बाँसवाड़ा,राजस्थान
 

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