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सूत्रधार संस्था द्वारा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता विषय पर ऑनलाइन परिचर्चा सम्पन्न
August 16, 2020 • ✍️सरिता सुराणा • समाचार
'सूत्रधार' साहित्यिक एवं सांस्कृतिक मंच द्वारा स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर एक विशेष परिचर्चा का आयोजन किया गया। आज यहां पर जारी प्रेस विज्ञप्ति में संस्था की संस्थापिका सरिता सुराणा ने बताया कि स्वतंत्रता दिवस के उपलक्ष्य में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमा क्या और कहां तक होनी चाहिए, इस विषय पर एक परिचर्चा का ऑनलाइन आयोजन किया गया। परिचर्चा का उद्देश्य लोगों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के प्रति जागरूकता पैदा करना था। ज्योति नारायण की गणेश वंदना से कार्यक्रम का शुभारंभ किया गया। तत्पश्चात अध्यक्ष सरिता सुराणा ने सभी सम्मानित अतिथियों का मंच की ओर से स्वागत किया। विषय पर अपने विचार व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि व्यक्ति के मनोभावों और विचारों को व्यक्त करने का मौलिक अधिकार है, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता। भारतीय संविधान के भाग 3 के अनुच्छेद 19(1) क के अनुसार प्रत्येक भारतीय नागरिक को वाक और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमा क्या है, इसे समझने के लिए हमें अनुच्छेद में वर्णित इन तीन शब्दों को समझना जरूरी है। वे हैं- वाक, नागरिक और अभिव्यक्ति। अनुच्छेद में नागरिक शब्द का प्रयोग इसलिए किया गया है कि यह अधिकार केवल भारतीय नागरिकों को ही प्राप्त है। उन्हें यह अधिकार विदेशों में भी प्राप्त है, इस शर्त पर कि वहां का कानून इस पर कोई रोक नहीं लगाता हो। वाक का शाब्दिक अर्थ है, बोलना। वाक की स्वतंत्रता का अर्थ है कि प्रत्येक भारतीय नागरिक को बोलने और भाषण आदि देने की स्वतंत्रता है। अभिव्यक्ति शब्द अपने आप में व्यापक अर्थ लिए हुए है। इसके अन्तर्गत मूवी, कार्टून, रेखाचित्र, थियेटर, कहानी, कविता, उपन्यास, न्यूज़ पेपर और सोशल मीडिया आदि सभी आते हैं। प्रकाशन और परिचालन का अधिकार भी इसी के अन्तर्गत आता है। अब प्रश्न यह है कि वे कौन-से निर्बन्धन हैं जो इस अधिकार के दुरुपयोग करने पर लगाए जा सकते हैं। इनमें प्रमुख हैं- भारत की संप्रभुता और अखंडता, देश की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध, लोक व्यवस्था, शिष्टाचार और सदाचार के हित में, न्यायालय की अवमानना, मानहानि, अपराध उद्दीपन आदि। जिस प्रकार 19(1) क के विरुद्ध निर्बंधन हैं, उसी प्रकार 19 (2) का उल्लंघन भी 19(1) के विरुद्ध है। 
इस परिचर्चा में अलग-अलग क्षेत्रों के विशेषज्ञ सम्मिलित हुए। रिटायर्ड कर्नल दीपक जी दीक्षित ने अपने संबोधन में कहा कि अपने मन के भावों और विचारों को व्यक्त करना ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। बच्चा पहले सिर्फ अपने हाव-भाव से अपनी बात को समझाने की कोशिश करता है लेकिन जैसे-जैसे वह बड़ा होता है, उसे बोलने के लिए शब्द मिल जाते हैं। फिर वह उनका प्रयोग अपने तरीके से करने लगता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर लगाम लगाने के लिए कोई तो नियामक आयोग या प्राधिकरण होना चाहिए। प्रसिद्ध उद्योगपति, समाजसेवी और वेदान्त दर्शन के मर्मज्ञ विद्वान सुरेश जी चौधरी ने अपने उद्बोधन में कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मर्यादा में होनी चाहिए। वाणी में मधुरता होनी चाहिए, जिससे वह सुनने वाले को प्रिय लगे। वाणी मनुष्य के लिए ईश्वर का वरदान है। हमारे बोलने से किसी की भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचनी चाहिए। वरिष्ठ कवयित्री ज्योति नारायण जी ने कहा कि हमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मिली है, उसका सम्मान करना चाहिए। हम सौभाग्यशाली हैं कि हम भारतवासी हैं और हमें अपने विचारों को व्यक्त करने की पूर्ण स्वतंत्रता है। नहीं तो ईरान, लेबनान, उत्तर कोरिया और बेलारूस जैसे देशों के नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ ही नहीं मालुम। मीडिया की भूमिका भी इस क्षेत्र में अहम है इसलिए मीडिया को भी वही सूचनाएं देनी चाहिए जो देशहित में हों। 
परिचर्चा को गति प्रदान करते हुए आईटी प्रोफेशनल श्रीया धपोला ने कहा कि देश में बने हुए कानून सबके लिए समान होने चाहिए। आजकल सोशल मीडिया पर लोग गलत तरह के मैसेज डालकर अफवाहें फैलाते हैं। कुछ लोग उन्हें सच मानकर दंगे भड़का देते हैं और राष्ट्रीय संपत्ति को नुकसान पहुंचाते हैं। यह बहुत गलत है। हमें हमारी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमा खुद ही तय करनी चाहिए और हम भाग्यशाली हैं कि भारत देश में रहते हैं, जहां बोलने की पूर्ण स्वतंत्रता है, नहीं तो उत्तर कोरिया जैसे देशों में नागरिकों को सरकार की हां में हां मिलानी पड़ती है। युवा इंजीनियर और लोक सदन न्यूज़ पेपर में संयोजक रमाकांत श्रीवास ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि अभी भी हम मानसिक रूप से स्वतंत्र नहीं हुए हैं। ग्रामीण भारत में आज भी युवाओं को खासकर लड़कियों को अपने निर्णय स्वयं लेने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं है। ऐसा नहीं होना चाहिए, उन्हें भी अपने जीवन के विषय में निर्णय लेने का अधिकार होना चाहिए। साथ ही यह भी कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का ये मतलब नहीं कि हम कुछ भी बोल सकते हैं। आज इंटरनेट के माध्यम से हम अपनी बात मिनटों में पूरे विश्व तक पहुंचा सकते हैं लेकिन हमें इसका दुरुपयोग नहीं करना चाहिए। 
राजस्थान हाईकोर्ट के एडवोकेट रामनिवास जी सैनी और कानपुर के हिन्दी दैनिक आज के वरिष्ठ पत्रकार सुबोध जी श्रीवास्तव अपनी व्यस्तताओं के कारण कार्यक्रम में शामिल नहीं हो पाए, उन्होंने अपनी शुभकामनाएं प्रेषित की। विषय से संबंधित बहुत-सी अन्य बातों पर भी सार्थक चर्चा की गई। यह परिचर्चा पूर्णतः सफल रही। सभी ने आशा व्यक्त की कि आगे भी ऐसी परिचर्चाएं होती रहेंगी। संस्थापिका ने सभी सहभागियों का हार्दिक आभार व्यक्त किया। रमाकांत ने मंच की ओर से सभी का आभार व्यक्त किया। राष्ट्र गान के साथ कार्यक्रम सम्पन्न हुआ।
 

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