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सूत्रधार और विश्व भाषा अकादमी द्वारा हिन्दी दिवस पर परिचर्चा गोष्ठी का आयोजन 
September 14, 2020 • ✍️सरिता सुराणा • समाचार
सूत्रधार साहित्यिक संस्था, हैदराबाद और विश्व भाषा अकादमी, भारत की तेलंगाना इकाई के संयुक्त तत्वावधान में गत दिवस हिन्दी दिवस के उपलक्ष्य में एक परिचर्चा गोष्ठी का ऑनलाइन आयोजन किया गया, जिसका विषय था- नई शिक्षा नीति में त्रिभाषा सूत्र कितना कारगर सिद्ध होगा और उसमें हिन्दी भाषा का कितना महत्व होगा? आज यहां पर जारी प्रेस विज्ञप्ति में संस्था की संस्थापिका सरिता सुराणा ने बताया कि कार्यक्रम का शुभारंभ ज्योति नारायण की सरस्वती वंदना से हुआ। तत्पश्चात् संस्था अध्यक्ष ने सभी सहभागियों का शब्द-पुष्पों से स्वागत किया। इस कार्यक्रम की अध्यक्षता हिन्दी भाषा के ख्याति प्राप्त विद्वान, लघुकथा विशेषज्ञ आदरणीय बी.एल.आच्छा जी ने की, जो चेन्नई से इस परिचर्चा गोष्ठी में शामिल हुए। संस्था अध्यक्ष ने संस्था का परिचय देते हुए कहा कि सूत्रधार साहित्यिक संस्था के गठन का उद्देश्य स्थापित साहित्यकारों के साथ नवोदित रचनाकारों को एक मंच प्रदान करना है ताकि उनसे मार्गदर्शन प्राप्त करके वे आगे बढ़ सकें। इसी तरह विश्व भाषा अकादमी भी हिन्दी भाषा और भारतीय भाषाओं को समृद्ध बनाने के लिए कार्यरत है। कार्यक्रम को प्रारम्भ करते हुए सरिता सुराणा ने तय विषय पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि शिक्षा में त्रिभाषा सूत्र का फार्मूला पहली बार सन् 1968 में इंदिरा गांधी सरकार द्वारा तैयार किया गया था। इसका उद्देश्य यह था कि छात्र अधिक भाषाएं सीख सकें, जिससे वे हमारे बहुभाषी देश में जहां पर भी रहें, वहां पर उन्हें भाषायी समस्या न हो। इस नीति के अनुसार हिन्दी भाषी राज्यों के छात्रों को अंग्रेजी, हिन्दी और एक आधुनिक भारतीय भाषा लेनी चाहिए जबकि गैर हिन्दी भाषी राज्यों के छात्रों को हिन्दी, अंग्रेजी और एक अन्य भारतीय भाषा लेनी चाहिए।
तमिलनाडु को छोड़कर यह फार्मूला पूरे देश में लागू किया गया था, वहां पर दो भाषाओं वाली नीति अपनाई गई थी। क्योंकि वहां पर सदैव हिन्दी भाषा का विरोध किया जाता रहा है। प्रथम दृष्टया देखा जाए तो यह विरोध केवल सियासी लगता है और राजनेताओं की हठधर्मिता के अलावा इसमें कोई ठोस कारण नहीं है विरोध करने का।
उनका कहना है कि उनके राज्य में हिन्दी पढ़ने-लिखने की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि उनके लिए उनकी मातृभाषा और अंग्रेजी भाषा, ये दो भाषाएं काफी हैं। हिन्दी भाषा हम पर थोपी जा रही है। लेकिन क्या वे यह नहीं जानते कि उनके राज्य में अन्य हिन्दी भाषी राज्यों से आए हुए लोग भी निवास करते हैं और उनके लिए हिन्दी पढ़ना-लिखना और बोलना उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि आपके लिए तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम आदि। क्या वे इस प्रश्न का जवाब दे सकते हैं कि अंग्रेजी उन पर किसने थोपी? भारत सरकार ने या स्वयं उन्होंने? क्या अंग्रेजी उनकी मातृभाषा है या अंग्रेजों के भारत आगमन से पूर्व उनके पूर्वज इस भाषा में संवाद करते थे? उनके इस हिन्दी विरोध को देखते हुए केन्द्र सरकार ने 2019 के ड्राफ्ट में परिवर्तन किया और उससे 'अनिवार्य हिन्दी पाठ' के खण्ड को वापस ले लिया। अब प्रश्न यह उठता है कि सिर्फ सियासी राजनीति के लिए उस भाषा का विरोध करना कहां तक उचित है, जो सर्वाधिक लोगों द्वारा बोली और समझी जाती है। नई शिक्षा नीति में त्रिभाषा के फार्मूले के अनुसार तीन भाषाओं में से दो भाषाएं भारतीय होनी चाहिए। अंग्रेजी को इसमें एक भारतीय भाषा नहीं माना जाएगा। दूसरी विशेष बात ये कि त्रिभाषा सूत्र के रूप में राज्यों, क्षेत्रों और विद्यार्थियों को भारतीय भाषाएं चुनने की आज़ादी होगी। हिन्दी भाषा की अनिवार्यता यहां पर समाप्त कर दी गई है। अब सवाल यह उठता है कि इससे हिन्दी भाषा का कितना भला होगा और जो छात्र हिन्दी भाषा पढ़ना चाहते हैं, वे जिस राज्य में रह रहे हैं वहां पर हिन्दी पढ़ाई ही न जाती हो तो वे क्या करेंगे?
 इसी विषय को विस्तार देते हुए वरिष्ठ कवयित्री और चिंतक ज्योति नारायण ने अपने उद्बोधन में कहा कि भाषा मात्र भाषा नहीं होती। उसके साथ हमारे संस्कार और परम्पराएं जुड़ी होती हैं, उनसे ही हमारी संस्कृति का निर्माण होता है। उन्होंने नई शिक्षा नीति में शिल्प और कौशल विकास को अधिक महत्व देने के लिए उसकी प्रशंसा की। प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में दिए जाने के प्रावधान को स्वागत योग्य कदम बताया। त्रिभाषा सूत्र को उन्होंने अति उत्तम विचार बताया और कहा कि हम जितनी अधिक भाषाएं सीखेंगे, उतना ही हम आगे बढ़ेंगे और हमारे ज्ञान में वृद्धि होगी। अब हमें मैकाले की अंग्रेजी शिक्षा नीति को ओढ़ने-बिछाने से छुटकारा मिल सकता है।
वेदांत दर्शन के मर्मज्ञ विद्वान आदरणीय सुरेश जी चौधरी कोलकाता से इस परिचर्चा गोष्ठी में सम्मिलित हुए। उन्होंने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि अगर स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् तुरन्त संस्कृत भाषा को शिक्षा और राजकाज की भाषा बना दिया जाता तो आज हमारे समक्ष हमारी अपनी एक राष्ट्रभाषा होती। उन्होंने अपना एक संस्मरण साझा करते हुए कहा कि एक बार वे अमेरिका के न्यूजर्सी में स्थित एक लाइब्रेरी में गए, जहां सभी देशों की भाषाओं की पुस्तकें बहुत ही करीने से सजाई हुई थी, अपने देश के नाम और उसकी राष्ट्रभाषा के नाम के साथ। जब उन्होंने हिन्दी भाषा की पुस्तकों के बारे में पूछा तो उनसे प्रश्न किया गया कि यह किस देश की भाषा है, वे इसके बारे में नहीं जानते। यह सुनकर उन्हें बहुत शर्मिंन्दगी महसूस हुई। उन्होंने इजरायल का उदाहरण देते हुए कहा कि इजरायल ने बहुत कम समय में अपनी इच्छा शक्ति से अपनी मातृभाषा के गौरव को लौटाया, अगर हमारे राजनेता चाहते तो वे भी ऐसा कर सकते थे लेकिन उन्होंने अंग्रेजी को ही प्राथमिकता दी और उसका खामियाजा हम सब अभी तक भुगत रहे हैं।
चेन्नई से तमिलभाषी लेखिका और अनुवादक डाॅ.जमुना कृष्णराज ने वीडियो के माध्यम से अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि स्वतंत्रता के पश्चात विदेशी भाषा अंग्रेजी को शिक्षा का माध्यम बनाया गया, इस नीति से हम अपनी मातृभाषा से दूर होते चले गए। हिन्दी साहित्य के पितामह भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जी ने कहा है-
'अंग्रेजी पढि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन।
पै निज भाषा ज्ञान बिना, रहत हीन को हीन।'
उन्होंने आगे कहा कि हम आज भी भारी-भरकम शुल्क देकर अपने बच्चों को अंग्रेजी मीडियम स्कूलों में पढ़ाते हैं फिर भी उन्हें अच्छे सुसंस्कृत और देशप्रेमी नागरिक बनाने में सफल नहीं हो पाते हैं अतः अब समय आ गया है कि हम राष्ट्रभाषा के माध्यम से एकजुट होकर अनेकता में एकता का परिचय दें। अंग्रेजी भाषा से व्यावसायिक तौर पर लाभ उठाया जा सकता है लेकिन दैनिक जीवन में इसे सीमित करने का समय आ गया है। नई शिक्षा नीति में त्रिभाषा सूत्र का हम स्वागत करते हैं और चाहते हैं कि इस त्रिभाषा सूत्र के लागू होने पर हिन्दी भाषा को अनिवार्य किया जाए ताकि हर नागरिक इसे सीखे और समझे। वे मातृभाषा और राष्ट्रभाषा हिन्दी के देश के कोने-कोने में पनपने के सुनहरे दिनों की प्रतीक्षा करते हैं। 
अध्यक्षीय वक्तव्य में डाॅ.बी.एल.आच्छा जी ने कहा कि भारतीय लोकतंत्र में सबके अपने-अपने स्वार्थ हैं। तमिल भाषी लोगों की शादी में हिन्दी फिल्मों के गीत गाए जाते हैं, वे एक बार किसी समारोह में शामिल हुए तो वहां पर आराधना फिल्म के गीत गाए जा रहे थे लेकिन ऊपरी तौर पर हिन्दी का विरोध किया जाता है। जब देवकीनंदन खत्री का विश्व प्रसिद्ध उपन्यास 'चन्द्रकान्ता संतति' प्रकाशित हुआ तो लोगों में उसे पढ़ने का जुनून इस कदर सवार था कि उसे पढ़ने के लिए 30 लाख लोगों ने हिन्दी भाषा सीखी। हमें अपनी भाषा को इतना मजबूत और प्रभावशाली बनाना होगा कि लोग स्वयं उसे अपनाएं। हमारी भारतीय भाषाओं में इतनी ताकत होनी चाहिए कि वे आकर्षण का केन्द्र बनें। एक भाषा सिर्फ बोलचाल तक सीमित नहीं है, उसके साथ उसे बोलने वालों की सम्पूर्ण संस्कृति जुड़ी हुई होती है। हम जहां पर भी रहते हैं, वहां की स्थानीय भाषा के 500 शब्द भी सीख लें और वहां के लोग हिन्दी भाषा के 500 नहीं तो 50 शब्द भी सीख लें तो यह हमारे लिए और सबके लिए अच्छा होगा। इससे हमें आपस में संवाद स्थापित करने में मदद मिलेगी। इसी तरह पढ़ाई के मामले में अगर एक बच्चे को 20 प्रतिशत क्वालीफाइड मार्क्स मिलते हैं तो उसे फेल नहीं माना जाना चाहिए। हमें भाषा के साथ-साथ वहां के खान-पान और जीवन शैली को भी कुछ अंशों में अपनाना चाहिए, जिससे वहां के लोगों को लगे कि ये हमारी संस्कृति का सम्मान करते हैं। 
नई शिक्षा नीति में त्रिभाषा सूत्र के अनुसार हिन्दी भाषा को किसी पर थोपा नहीं गया है। यह मात्र एक दस्तावेज है। मातृभाषा में शिक्षा की पहल निश्चित रूप से प्रशंसनीय है। इस शिक्षा नीति को अगर सही ढंग से लागू किया गया तो इसके बहुत अच्छे परिणाम सामने आएंगे। उन्होंने आगे कहा कि हमें अधिक से अधिक भाषाएं सीखनी चाहिए, जिससे हम उन भाषाओं के अच्छे साहित्य से परिचित हो सकें और उसका हिन्दी में अनुवाद करके अधिकाधिक लोगों तक उसे पहुंचा सकें। अंत में सभी प्रतिभागियों ने इस बात पर अपनी सहमति जताई कि अगर हमें हमारी संस्कृति और संस्कारों की रक्षा करनी है तो हमें अपनी जड़ों की ओर लौटना होगा। जो शिल्प कलाएं, हस्त कलाएं और ग्रामीण उद्योग खत्म होने के कगार पर हैं, उन्हें पुनर्जीवित करना होगा, तभी हम अपनी युवा शक्ति के श्रम का सही उपयोग करके देश से बेरोजगारी दूर कर पाएंगे। आज युवा पीढ़ी स्टार्ट अप के लिए तैयार है, उसे नई दिशा और नई सोच के साथ उचित मार्गदर्शन की आवश्यकता है। हिन्दी भाषा भी रोजगार की भाषा बन सकती है। ज्योति नारायण के धन्यवाद ज्ञापन के साथ यह परिचर्चा गोष्ठी सम्पन्न हुई। सभी सहभागियों ने इस परिचर्चा के सफल आयोजन के लिए सूत्रधार साहित्यिक संस्था और विश्व भाषा अकादमी का आभार व्यक्त किया। जो सहभागी किसी कारण वश इसमें सम्मिलित नहीं हो पाए, उन्होंने फ़ोन के माध्यम से अपनी शुभकामनाएं प्रेषित की। 
 

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