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शुद्धिकरण का अनुपम प्रयोग-पंचकर्म
November 1, 2019 •  डॉ अरविन्द जैन • लेख

*डॉ अरविन्द जैन*

चिकित्सा दो प्रकार की होती हैं पहली लाक्षणिक और दूसरी जिसके कारणरोग उतपन्न हुआ. वर्तमान में लाक्षणिक चिकित्सा का ही बोलबाला होता हैं ,प्रत्येक लक्षण के अनुसार इलाज़ ,जबकि आयुर्वेद में जिस कारण से रोग उतपन्न हुआ उसको दूर करना .कारण दूर होने से आप शीघ्र रोगमुक्त हो सकते हैं .इसीलिए आयुर्वेद में पंचकर्म चिकित्सा रोगों के कारणों को दूर कर स्वस्थ्य बना देती हैं
गठिया, लकवा, पेट से जुड़े रोग, साइनस, माइग्रेन, सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस, साइटिका, बीपी, डायबीटीज, लिवर संबंधी विकार, जोड़ों का दर्द, आंख और आंत की बीमारियों आदि के लिए पंचकर्म किया जाता है।
आयुर्वेद में तन-मन को दुरुस्त रखने के लिए कई उपाय बताए गए हैं। इनमें से पंचकर्म काफी अहम है। पंचकर्म के उपयोग से कैसे तन-मन की परेशानियों को काफी हद तक कम कर सकते हैं, .
आयुर्वेद कहता है कि मनुष्य का शरीर जिन 5 तत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायु) से बना है, उन्हीं तत्वों से ब्रह्मांड भी बना है। जब शरीर में इन 5 तत्वों के अनुपात में गड़बड़ी होती है तो दोष यानी समस्याएं पैदा होती हैं। आयुर्वेद इन तत्वों को फिर से सामान्य स्थिति में लाता है और इस तरह से रोगों का निदान होता है। गठिया, लकवा, पेट से जुड़े रोग, साइनस, माइग्रेन, सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस, साइटिका, बीपी, डायबीटीज, लिवर संबंधी विकार, जोड़ों का दर्द, आंख और आंत की बीमारियों आदि के लिए पंचकर्म किया जाता है।
पंचकर्म की बात
पंचकर्म को आयुर्वेद की खास चिकित्सा विधि माना जाता है। यह शरीर की शुद्धि (डिटॉक्सिफिकेशन) और पुनर्जीवन (रिजूविनेशन) के लिए उपयोग किया जाता है। इस चिकित्सा विधि से तीनों शारीरिक दोषों: वात, पित्त और कफ को सामान्य अवस्था में लाया जाता है और शरीर से इन्हें बाहर किया जाता है। शरीर के विभिन्न अंगों और रक्त को दूषित करने वाले अलग-अलग रसायनिक और विषैले तत्वों को शरीर से बाहर निकालने के लिए विभिन्न प्रकार की प्रक्रियाएं प्रयोग में लाई जाती हैं। इन प्रक्रियायों में पांच कर्म प्रधान हैं। इसीलिए इस खास विधि को 'पंचकर्म' कहते हैं।
इस विधि में शरीर में मौजूद विषों (हानिकारक पदार्थों) को बाहर निकालकर शरीर का शुद्धिकरण किया जाता है। इसी से रोग निवारण भी हो जाता है। यह शरीर के शोधन की क्रिया है जो स्वस्थ मनुष्य के लिए भी फायदेमंद है। आयुर्वेद का सिद्धांत है: रोगी के रोग का इलाज करना और स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य को बनाए रखना। पंचकर्म चिकित्सा आयुर्वेद के इन दोनों उद्देश्यों की पूर्ति के लिए सर्वोत्तम है। इसीलिए सिर्फ शारीरिक रोग ही नहीं बल्कि मानसिक रोगों की चिकित्सा के लिए भी पंचकर्म को सर्वश्रेष्ठ चिकित्सा माना जाता है।
इसमें पांच प्रधान कर्म होते हैं लेकिन इन्हें शुरू करने से पहले दो पूर्व कर्म भी जरूरी हैं। ये हैं स्नेहन और स्वेदन। इन दो विभिन्न प्रक्रियाओं के जरिए शरीर में व्याप्त दोषों को बाहर निकलने लायक बनाया जाता है।
प्रधान कर्म (काय चिकित्सानुसार) के अनुसार निम्न हैं:
1. वमन 2. विरेचन 3. आस्थापन वस्ति 4. अनुवासन वस्ति 5. नस्य
यहां ध्यान देने की बात यह है कि शल्य चिकित्सा संबंधी शास्त्रों के अनुसार आस्थापन और अनुवासन वस्ति को वस्ति शीर्षक के अंतर्गत लेकर तीसरा प्रधान कर्म माना गया है और पांचवां प्रधान कर्म 'रक्त मोक्षण' को माना गया है।
पंचकर्म विधि:
पूर्व कर्म
1. स्नेहन: स्नेह शब्द का तात्पर्य शरीर को स्निग्ध करने से है। स्नेहन शरीर पर तेल आदि स्निग्ध पदार्थों का अभ्यंग (मालिश) करके की जाती है या फिर पिलाकर। कुछ रोगों की चिकित्सा में स्नेहन को प्रधान कर्म के रूप में भी प्रयोग किया जाता है। पंचकर्म चिकित्सा पद्धति की मुख्य थेरपी शिरोधारा को भी स्नेहन कर्म के तहत माना जाता है।
स्नेहन थेरपी के अंतर्गत इन चार प्रमुख स्नेहों (चिकनाई) का प्रयोग किया जाता है:
1. घृत
2. मज्जा
3. वसा
4. तेल
इनमें घृत (गाय की घी) को उत्तम स्नेह माना गया है। ये चारों स्नेह मुख्य रूप से पित्त को खत्म करने वाले होते हैं। औषधि से सिद्ध विभिन्न तेलों का प्रयोग पंचकर्म के लिए किया जाता है जिनका आधार खासतौर पर तिल का तेल होता है जबकि दूसरे तेलों का भी प्रयोग भी आधार के रूप में किया जाता है।
2. स्वेदन: यह वह प्रक्रिया है जिससे स्वेद अर्थात पसीना पैदा हो। वाष्प स्वेदन में स्टीम बॉक्स में रोगी को लिटाकर या बिठाकर स्वेदन किया जाता है। रुक्ष स्वेदन के लिए इंफ्रारेड लैंप लगे हुए बॉक्स का प्रयोग किया जाता है।
स्वेदन के तरीके
1. एकांग स्वेद: अंग विशेष का स्वेदन
2. सर्वांग स्वेद: पूरे शरीर का स्वेदन
अ. अग्नि स्वेद: आग के सीधे संपर्क से स्वेदन
ब. निरग्नि स्वेद: आग के सीधे संपर्क के बिना स्वेदन
सुश्रुत संहिता के अनुसार पंचकर्म के तहत आने वाले 5 मुख्य प्रधान कर्म:
1. वमन
आयुर्वेद कहता है कि मौसम, रोगी और रोग के अनुसार मरीज का इलाज करना चाहिए। जब शरीर के दूषित पदार्थ स्नेहन और स्वेदन के द्वारा अमाशय में इकट्ठा हो जाते हैं तो उन्हें बाहर निकालने के लिए वमन का सहारा लिया जाता है। वमन यानी उल्टी कराकर मुंह से दोषों को निकालना वमन कहलाता है। वमन को कफ से जुड़ी समस्याओं के समाधान के लिए मुफीद बताया गया है। स्नेहन व स्वेदन क्रिया द्वारा कफ-प्रधान रोगों में जो कफ अपने स्थान से हटा दिया जाता है, उसे ठीक तरह से शरीर के बाहर निकाल देना भी जरूरी है। अगर ऐसा नहीं किया जाता तो आशंका रहती है कि विरेचन औषधि देने से कफ आंतों में चिपक कर पेट के रोग पैदा कर सकता है। अमूमन वसंत ऋतु में वमन विधि से इलाज किया जाता है।
वमन विधि से उपचार: खांसी, दमा, सीओपीडी, प्रमेह, डायबीटीज, एनीमिया, पीलिया, मुंह से जुड़े रोग, ट्यूमर आदि।
वमन विधि से कौन न कराए इलाज: गर्भवती स्त्री, कोमल प्रकृति वाले लोग, शारीरिक रूप से बेहद कमजोर इंसान आदि।
2. विरेचन
गुदामार्ग से दोषों को निकालना विरेचन कहलाता है। विरेचन से अमाशय, हार्ट और लंग्स से दूषित पदार्थ बाहर निकल जाता है और शरीर में शुद्ध रक्त का संचार होने लगता है। विरेचन को पित्त दोष की प्रधान चिकित्सा कहा जाता है।
किस तरह के रोगों का इलाज: सिरदर्द, बवासीर, भगंदर, गुल्म, रक्त पित्त आदि।
इस विधि से कौन न कराए इलाज: टीबी और एड्स जैसे रोगों से पीड़ित व्यक्ति को विरेचन नहीं कराना चाहिए। ऐसे व्यक्ति को भी विरेचन नहीं कराना चाहिए जो बुखार से पीड़ित हो या रातभर जागा हो।
3. वस्ति
इस प्रक्रिया में गुदामार्ग या मूत्रमार्ग के द्वारा औषधि शरीर में प्रवेश कराया जाता है ताकि रोग का इलाज हो सके। वस्ति को वात रोगों की प्रधान चिकित्सा कहा गया है।
यह दो तरह का होता है: आस्थापन और अनुवासन। चरक संहिता में इन दोनों को दो अलग-अलग कर्म माने गए हैं।
आस्थापन या निरुह वस्ति: इसमें विभिन्न औषधि द्रव्यों के क्वाथ (काढ़े) का प्रयोग किया जाता है। यह वस्ति क्रिया शरीर के दोषों को चलायमान करती है, शोधन करती है और फिर इन्हें शरीर से बाहर निकालती है।
अनुवासन वस्ति: इसमें विभिन्न औषधि द्रव्यों से सिद्ध स्नेह का प्रयोग किया जाता है। इसमें प्रयुक्त द्रव्य यदि शरीर के भीतर भी रह जाए तो कोई हानि नहीं होती। पहली वस्ति से मूत्राशय और प्रजनन अंगों को बेहतर किया जाता है। दूसरी बार दी जाने वाली वस्ति से मस्तिष्क विकारों और चर्म रोगों में शांति मिलती है। इसके बाद दी जाने वाली हर वस्ति से शरीर में बल की वृद्धि होती है और रस व रक्त आदि धातुएं शुद्ध हो जाती हैं।
किस तरह के रोगों का इलाज: न्यूरो और जोड़ों के रोग, वीर्य की कमी या वीर्य का दूषित होना, योनि मार्ग और प्रजनन संबंधी रोग आदि।
कौन न कराए इलाज: भोजन किए बिना अनुवासन वस्ति और भोजन के बाद आस्थापन वस्ति नहीं किया जाता है। अत्यधिक दुबले-पतले और कमजोर लोगों को वस्ति नहीं दी जाती। खांसी और दमा के रोगी या जिन्हें उल्टियां हो रही हों, उन्हें भी वस्ति नहीं दी जाती।
4. नस्य
नाक से औषधि को शरीर में प्रवेश कराने की क्रिया को नस्य कहा जाता है। नस्य को गले और सिर के सभी रोगों के लिए उत्तम चिकित्सा कहा गया है।
मात्रा के अनुसार नस्य के दो प्रकार हैं
1. मर्श नस्य: 6, 8 या 10 बूंद नस्य द्रव्य को नाक में डाला जाता है।
2. प्रतिमर्श नस्य: 1 या 2 बूंद औषधि को नाक में डाला जाता है। इसमें नस्य की मात्रा कम होती है इसलिए इसे जरूरत पड़ने पर रोज भी लिया जा सकता है।
किस तरह के रोगों का इलाज: जुकाम, साइनोसाइटिस, गले के रोग, सिर का भारीपन, दांतों और कानों के रोग आदि।
कौन न कराए इलाज: अत्यंत कमजोर व्यक्ति, सुकुमार रोगी, मनोविकार वाले रोगी, अति निद्रा से ग्रस्त लोग आदि।
5. रक्त मोक्षण
शल्य चिकित्सा संबंधी शास्त्रों के अनुसार पांचवां कर्म 'रक्त मोक्षण' माना गया है। रक्त मोक्षण का मतलब है शरीर से दूषित रक्त को बाहर निकालना। आयुर्वेद में खून की सफाई के लिए जलौकावचरण (लीच थेरपी) का विस्तार से वर्णन किया गया है। किस तरह के घाव में जलौका यानी जोंक (लीच) का उपयोग करना चाहिए, यह कितने तरह की होती है, जलौका किस तरह से लगानी चाहिए और उन्हें किस तरह रखा जाता है, जैसी बातों को सुश्रुत संहिता में विस्तार से बताया गया है।
आर्टरीज और वेन्स में खून का जमना और पित्त की समस्या से होने वाले बीमारियों मसलन, फोड़े-फुंसियों और त्वचा से जुड़ी परेशानियों में लीच थेरपी से जल्दी फायदा होता है।
जलौका दो तरह के होती हैं:
सविष (विषैली) और निर्विष (विष विहीन)
आयुर्वेद में इलाज के लिए निर्विष जलौका का उपयोग किया जाता है। आप भी इन्हें आसानी से पहचान सकते हैं। निर्विष जलौका जहां हरे रंग की चिकनी त्वचा वाला और बिना बालों वाला होती है, वहीं सविष जलौका गहरे काले रंग का और खुरदरी त्वचा वाली जिस पर बाल भी होती हैं। ऐसा माना जाता है कि जलौका दूषित रक्त को ही चूसती है, शुद्ध रक्त को छोड़ देता है। जलौका (लीच) लगाने की क्रिया सप्ताह में एक बार की जाती है। इस प्रक्रिया में मामूली-सा घाव बनता है, जिस पर पट्टी करके उसी दिन रोगी को घर भेज दिया जाता है।
नोट: सुश्रुत संहिता के अनुसार, दोनों तरह की वस्ति को एक ही माना गया है और इसमें 5वें को रक्त मोक्षण।
पंचकर्म के साथ आयुर्वेद बीमारियों से बचने के लिए बेहतर खानपान पर भी जोर देता है:
- हरी सब्जियों, सालादों और प्रोटीनयुक्त डाइट की मात्रा बढ़ाएं।
- ऑयली, जंक फूड, कोल्ड ड्रिंक आदि से दूर रहें।
- फ्रिज का ठंडा पानी न पिएं।
- गुनगुना या सामान्य पानी सेहत के लिए अच्छा है।
- खाने के फौरन बाद पानी न पिएं। कम से कम आधे घंटा का गैप जरूर हो।
- जितनी भूख हो, उससे कम खाना खाएं। हां, ध्यान रखें कि खाना अचानक कम न करें। धीरे-धीरे कम करेंगे तो शरीर और मन दोनों को तालमेल बिठाना आसान होगा।
- सूर्यास्त के बाद खाना न खाएं। अगर यह मुमकिन नहीं है तो रात में 8 बजे से पहले जरूर खा लें।
- खाना खाने के बाद फौरन ही बेड पर जाकर नींद में न पहुंच जाएं। खाने और सोने में कम से कम 2 से 3 घंटे का गैप जरूर होना चाहिए।
- हर रोज सुबह खाली पेट 4-5 तुलसी के पत्तों का प्रयोग करें। इससे इम्यून सिस्टम मजबूत होता है।
- एक कच्चा आंवला हर दिन खाएं, लेकिन खाली पेट इसे न खाएं।
प्रदुषण  के दुष्प्रभाव से बचने के लिए पंचकर्म
वैसे तो शरीर से हानिकारक पदार्थ निकालने के कई तरीके हैं, लेकिन हर दिन जो हम पलूशन झेलते हैं उसका असर कम करने के लिए तेल या शुद्ध घी का उपयोग करने से फायदा होता है।
नाक के दोनों छिद्रों के अंदर सरसों का तेल या देसी घी लगाएं। इससे हवा में मौजूद खतरनाक कण कम मात्रा में फेफड़े में पहुंचते हैं। घर से बाहर निकलते समय तो हमेशा लगाएं, चूंकि घर में भी धूल कण होता है, इसलिए घर के अंदर रहने पर भी इन्हें लगाएं।
स्वेदन और स्नेहन से भी फायदा
सलाह दी जाती है कि शरीर के अंदर कुछ गर्म पेय पहुंचते रहना चाहिए। इसके लिए शाम में ऑफिस से घर पहुंचते ही 2 गिलास गर्म पानी या एक गिलास गर्म दूध या एक कप गर्म चाय (दूध वाली) लें। इसके फौरन बाद ही 15 से 20 मिनट तक मुंह समेत पूरे शरीर को किसी मोटी चादर या कंबल से ढंक लें। इससे शरीर से पसीना निकलेगा। इस पसीने के माध्यम से शरीर में मौजूद पल्यूटेंट्स भी बाहर आ जाएंगे। अगर मुमकिन हो तो दूध, चाय या पानी को उबालते समय इसमें आधा चम्मच सौंठ, 3-4 काली मिर्च, आधा चम्मच पीपल और 4-5 तुलसी के पत्ते को भी उबाल कर लेने से काफी फायदा होता। इससे शरीर की इम्यूनिटी बढ़ जाती है। इसे हर दिन ले सकते हैं।
विरेचन
सुबह उठते ही दो गिलास गुनगुना पानी पिएं। इससे पेट में मौजूद प्रदूषण के कण मल के साथ आसानी से बाहर निकल जाएंगे।
स्नेहन
रात को सोने से पहले एक चम्मच कैस्टर या बादाम का तेल गर्म दूध के साथ पीने से पेट साफ होगा।
आज के समय में बेहद उपयोगी
आजकल संक्रामक रोगों और लाइफस्टाइल से जुड़ी हुई समस्याएं काफी बढ़ रही हैं। साथ ही, इम्यून सिस्टम से जुड़ी हुई परेशानियां भी कम नहीं हैं। वजह है, शरीर में विषैले तत्वों का पहुंचना और शरीर की इम्यूनिटी का कम होना। ये विषैले तत्व हवा के अलावा सब्जियों, फलों, अन्न आदि में मौजूद विभिन्न रसायनों और कीटनाशकों की वजह से पहुंचते हैं। इनके लगातार उपयोग से बीमारियां पैदा होती हैं। एक्सपर्ट्स बताते हैं कि अगर हम साल में एक बार पंचकर्म करवा लें तो इन तमाम समस्याओं से बच सकते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि पंचकर्म शरीर और मन के विकारों को दूर कर आपको स्वस्थ करता है और शरीर की कोशिकाओं को नया बल और जीवन देता है।
लाइफस्टाइल में बदलाव
- अगर बैठकर काम करने की मजबूरी है और इस वजह से शरीर का वजन बढ़ रहा है तो सचेत हो जाने की जरूरत है।
- फिजिकल ऐक्टिविटीज जरूर करें। इससे रक्त संचार तेज होगा और ज्यादा से ज्यादा मात्रा में शरीर से हानिकारक पदार्थ फिल्टर होकर पसीना और मूत्र मार्ग से बाहर निकलेगा।
- सुबह की सैर, वॉकिंग फायदेमंद है।
- सुबह कम से कम 20 से 30 मिनट योग और प्राणायाम जरूर करें।
आयुर्वेद में भी होती है सर्जरी
आयुर्वेद भारत का बहुत ही पुराना इलाज का तरीका है। जड़ी-बूटियों के अलावा मिनरल्स, लोहा (आयरन), मर्करी (पारा), सोना, चांदी जैसी धातुओं के जरिए इसमें इलाज किया जाता है। हालांकि, कुछ लोग ही इस बात को जानते हैं कि आयुर्वेद में सर्जरी (शल्य चिकित्सा) का भी अहम स्थान है।
शल्य तंत्र (सर्जरी): वे बीमारियां जिनमें सर्जरी की जरूरत होती है जैसे फिस्टुला, पाइल्स आदि।
सर्जरी शुरुआत से ही आयुर्वेद का एक खास हिस्सा रहा है। महर्षि चरक ने जहां चरक-संहिता को काय-चिकित्सा (मेडिसिन) के एक अहम ग्रंथ के रूप में बताया है, वहीं महर्षि सुश्रुत ने शल्य-चिकित्सा (सर्जरी) के लिए सुश्रुत संहिता लिखी। इसमें सर्जरी से संबंधित सभी तरह की जानकारी उपलब्ध है।
आयुर्वेदिक सर्जरी की खासियत
खून में होने वाली गड़बड़ी को आयुर्वेद में बीमारियों का सबसे अहम कारण माना गया है। इन्हें दूर करने के दो उपाय बताए गए हैं- पहला है, सिर्फ दवाई लेना और दूसरा दवाई के साथ खून की सफाई (रक्त-मोक्षण)। दूषित रक्त को हटाना सर्जरी की एक प्रक्रिया है। इसके लिए आयुर्वेद में खास विधि अपनाई जाती है।
कुछ अहम सवाल
क्या पंचकर्म की सभी क्रियाएं एक साथ होती हैं?
-ऐसा नहीं है। पूर्व कर्म जिनमें स्नेहन और स्वेदन हैं। ये दोनों एकसाथ भी हो सकते हैं और अलग-अलग भी। वहीं प्रधान कर्म वमन और विरेचन अलग-अलग समय या दिन में होते हैं। इन प्रक्रियाओं को करने में कितना वक्त लगेगा, यह व्यक्ति की उम्र और उसकी जरूरत पर निर्भर करता है। अमूमन वमन और विरेचन 1 से 7 दिन तक चल सकते हैं। पहले वमन होगा, इसके बाद विरेचन की क्रिया पूर्ण की जाती है। इसके बाद ही वस्ति संपन्न होगी। यहां एक बात का ध्यान रखना जरूरी है कि पंचकर्म में लगने वाला समय वैद्य से मिलने के बाद ही पता चलता है। अगर समस्या बड़ी है तो ज्यादा वक्त लग सकता है, नहीं तो एक दो बार में भी परेशानी खत्म हो सकती है।
क्या इसके लिए अस्पताल में भर्ती किया जाता है?
- जिन पंचकर्म अस्पतालों में ये सुविधाएं उपलब्ध हैं, वहां पर जरूरतमंद ठहर सकते हैं। अहम बात यह है कि इन प्रक्रियाओं को ओपीडी में भी सरलतापूर्वक संपन्न किया जा सकता है। सभी पंचकर्म केंद्रों की ओपीडी में इस तरह की सुविधाएं उपलब्ध होती हैं।
क्या इससे रोग पूरी तरह से ठीक हो जाते हैं?
- जिन बीमारियों को ठीक करने के लिए पंचकर्म की पद्धतियों का उपयोग किया जाता है, उनमें ये पूरी तरह कारगर हैं। मसलन स्पॉन्डिलाइटिस, बैकपेन, स्लिप डिस्क, साइनोसाइटिस, माइग्रेन आदि। इनके अलावा डिप्रेशन, तनाव और चिंता जैसी परेशानियों में भी पंचकर्म बहुत उपयोगी है।
किस तरह की समस्याओं में पंचकर्म सफल नहीं है।
- जन्म के समय पैदा हुई समस्याओं को ठीक करने में यह सक्षम नहीं है।
मिथ मंथन
मसाज कराना पंचकर्म में शामिल है?
- नहीं। मसाज कराना पंचकर्म की पूर्व क्रिया है। इसे पंचकर्म मान लेना गलत है।
आयुर्वेद में इलाज काफी लंबा चलता है?
- आयुर्वेद कभी भी बीमारी में तात्कालिक लाभ के उपाय नहीं करता। यह समस्या को जड़ से खत्म करता है, इसलिए कुछ ज्यादा वक्त लग सकता है। यहाँ एक बात का ध्यान रखना आवश्यक हैं की वर्तमान में हमारा खान पान ,आहार चिकित्सा रसायनों से युक्त होने से रसायन का इलाज़ रसायन से होता हैं .यदि आप प्राकृतिक जीवन शैली अपनाये तो आपको शीघ्र लाभ मिलता हैं .
कोई भी पंचकर्म करा सकता है?
- अमूमन 16 साल से कम और 70 साल से ज्यादा उम्र के लोगों को पंचकर्म से ज्यादा फायदा नहीं होता क्योंकि इनमें धातुओं की कमी रहती है। इनके अलावा किस शख्स को पंचकर्म कराना चाहिए और किसे नहीं, ये बातें जानकार वैद्य ही बता सकते हैं। इसलिए पंचकर्म शुरू करवाने से पहले वहां के वैद्य से जरूर सलाह लें। इसके अलावा अगर किसी बच्चे को ऐसी शारीरिक या मानसिक दुर्बलता है जिसके कारण उसे चलने-फिरने, उठने-बैठने में कठिनाई हो रही हो या मानिसक विकास ठीक से न हुआ हो तो इसमें उम्र की कोई सीमा नहीं होती।
क्या आयुर्वेद की दवाएं गर्म होती हैं?
 - ऐसा बिल्कुल नहीं है। यह रोगों और मौसमों के आधार पर इलाज करता है।
 क्या आयुर्वेद की दवाओं में स्टेरॉइड्स होते हैं?
 - आयुर्वेदिक दवाओं में केमिकल का उपयोग नहीं होता। काफी पौधों में फाइटोस्टेरॉइड्स (नैचरल रूप में मिलने वाले स्टेरॉइड्स) होते हैं और उनका किसी भी व्यक्ति पर प्रयोग हानिकारक नहीं होता। यह हर तरीके से फायदेमंद होता है। इनका उपयोग भी काफी कम मात्रा में किया जाता है।(सन्दर्भ ---सुश्रुत्र संहिता,नवभारत टाइम्स)
*डॉ अरविन्द प्रेमचंद जैन, संरक्षक शाकाहार परिषद् A2 /104  पेसिफिक ब्लू ,नियर  डी मार्ट, होशंगाबाद रोड, भोपाल 462026  मोबाइल 09425006753

 

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