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श्रमेव जयते
May 4, 2020 • धर्मेन्द्र बंम • कविता

*धर्मेन्द्र बंम

तुम हो  प्यारे  युग  निर्माता 
वसुंधरा के  तुम  हो  भ्राता 

श्रम से तो न कभी घबराता
श्रम से ही तो सबकुछ पाता 

श्रम ही सेवा  श्रम ही पूजा
श्रम के बिना न कोई  दूजा  

संघर्षों   में   हार  न   माने
श्रम से ही तो जग पहचाने

श्रम की महिमा को पहचानो
श्रम को  ईश्वर  के सम मानो

डगर डगर पर  साथ निभाता
श्रम है सबका भाग्य  विधाता

*धर्मेन्द्र बंम, नागदा, उज्जैन

 

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