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श्रम की क्रांति 
May 1, 2020 •  अशोक 'आनन' • गीत/गजल

 *अशोक 'आनन'
 
बंद करो तुम धर्म - युद्ध   और  जुट जाओ निर्माण में ।
श्रम के बल पर श्रम की क्रांति ; ला  दो  हिन्दुस्तान में ।
 
श्रम तुम्हारा मोती बनकर  ;
चेहरे पर चम - चम चमके ।
हाथ तुम्हारे रूकें कभी न  ;
जीवन  भर  अब  श्रम  के ।
ग़म भुला दे सारी दुनिया  ;  तुम्हारी  एक  मुस्कान में ।
श्रम के बल पर श्रम की क्रांति ; -------------------------।
 
जब भी तुम्हारा बहा पसीना  ;
खुशियां   ही   तुम  लाए   हो ।
बैठें  जब  भी  हाथ  थामकर  ;
संकट     ही    मॅंडराया     है ।
श्रम की ऐसी चाह जगा दो  ;  भारत के हर इंसान में ।
श्रम के बल पर श्रम की क्रांति ; ----------------------- ।
 
 
व्यर्थ   कभी   न   जाए  शक्ति  ;
सही  -  सही    उत्पादन     हो ।
गंगा जल - सा आज श्रमिकों ;
श्रम     तुम्हारा     पावन    हो ।
श्रम  की  गंगा  तुम  बहा  दो  ;  सारे  रेगिस्तान  में ।
श्रम के बल पर श्रम की क्रांति ; -----------------------।
 
श्रम  की  पूजा  करने  वाले  ;
श्रम   के   तुम   पुजारी   हो ।
भारत  मां  के भाग्य विधाता ;
जय - जयकार   तुम्हारी। हो ।
कमी  कभी न आने पाए  ;  अपने  स्वाभिमान  में ।
श्रम के बल पर श्रम की क्रांति ; ----------------------।
 
*अशोक 'आनन '
 मक्सी,जिला - शाजापुर ( म.प्र.)
 

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