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शहरों में आ गए
May 8, 2020 • अशोक 'आनन ' • गीत/गजल

                   
*अशोक 'आनन '
 
गांव छोड़  हम शहरों  में आ गए ।
दुनिया की सारी खुशियां पा गए ।
 
सर्व सुविधायुक्त है मक़ान ।
       यंत्रवत - सा  है हर इंसान ।
                भीड़  भरा शहर भी लगता  -
                        हो  जैसे   कोई    श्मशान ।
बब्बा ,  दद्दा ,  अम्मां  जैसे -
संबोधन  हम  भुला   गए ।
 
सूरत उनकी भोली - भाली ।
       शहद सरीखी जिनकी बोली ।
              हम भी पल में उनके हो गए -
                     प्रेम की जिनने पोथी खोली ।
आंगन , देहरी, तुलसी , बरगद -
अपनी आंखें फिर भिंगो  गए ।
 
 
मोम  सरीखे  न  हृदय  मिले ।
     नागफनियों में  न फूल खिले ।
            घर  के  पतों  पर न घर मिले -
                  घरों  के  ख़ारिज हुए दाख़िले ।
अपनों  की  हाटों  से ज़्यादा -
गैरों  के  अब  मेले  भा  गए ।
 
*अशोक 'आनन '
  मक्सी,जिला-शाजापुर ( म.प्र.)
 

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