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सीमित साधनों में आत्मनिर्भर हो गए लॉकडाउन में
May 29, 2020 • डॉ. हरिकृष्ण बड़ोदिया • लॉकडाउन से सीख

वैश्विक महामारी कोरोना ने आज आम आदमी के जीवन को झकझोर कर रख दिया है। सारी गतिविधियां चाहे वे आर्थिक हों या सामाजिक सभी सुप्त प्राय हो गई हैं । समाज का मध्यम और निम्न मध्यम तथा निम्न वर्ग परेशानियों के साथ जीवन यापन के लिए मजबूर है। कोरोना काल में लॉक डाउन की स्थितियों ने जीवन में कई प्रतिबंधों के साथ जीना सिखाया है। लगातार घर के अंदर कैद होने के साथ-साथ प्रारंभिक दिनों में तो दैनिक आवश्यकताओं की वस्तुओं का भी अभाव दिखाई देता रहा। पहले लॉक डाउन ने जीवन की सारी गतिविधियां अचानक बदल दीं, जिन घरों में दैनिक काम में नौकरों की मदद ली जाती थी वहां नौकरों का अभाव किसी त्रासदी से कम नहीं था। सारे कामों का उत्तरदायित्व परिवार के सदस्यों पर आन पड़ा। जीवन यापन के कई साधनों की सीमितता ने परिवारों को मितव्ययी बनाने में मदद की। जिन वस्तुओं के बिना प्राय: हमारा जीवन आगे ही बढ़ना मुश्किल लगता रहा था उन वस्तुओं के बिना भी जीवन का आनंद लिया जाने लगा। जिन परिवारों में पति और पत्नी दोनों सर्विस में रहे और जो नौकरों के बिना जीवन की कल्पना नहीं कर सकते थे वे भी अब घर पर रहते हुए सीमित साधनों में आत्मनिर्भर हो गए। संस्थानों से जुड़े लोगों को वर्क फ्रॉम होम का अनुपालन कर अपनी गतिविधियों को संचालित करना पड़ा। कई परिवारों की मासिक तनख्वाह में कमी तो हुई किन्तु खर्चों में कटौती ने उसका सामंजस्य कर दिया। इस कोरोना काल में जो बात रेखांकित करने वाली है वह यह है कि अधिकांश लोगों ने सादा और सुपाच्य खाना खाकर जीवन को ज्यादा आनंदमयी  बनाया। दूसरी ओर जो परिवार अधिकांशत: रेस्टोरेंट या बाहर के खाने पर आश्रित थे उन्हें भी स्वयं अपना भोजन बनाना पड़ा जो आत्मनिर्भरता के रूप में देखा जा सकता है यह सही है कि कोरोना ने आम जीवन को भयभीत किया लेकिन उतना भी ही यह भी सही है कि इसने हमारे जीवन को बहुत सारे पाठ पढ़ाए। स्वच्छता, मितव्ययिता, सीमित साधनों में जीवन यापन और आत्मनिर्भरता के साथ जीवन जीने के तरीकों में आमूलचूल परिवर्तन हुए तथा कई प्रतिबंधों के साथ और इस महामारी के साथ जीने के सूत्र दिए। इस काल में पर्यावरण भी साफ सुथरा हुआ क्योंकि सड़कों पर बड़े छोटे वाहनों के पहिए थम गए जिससे प्रदूषण का प्रसार कम हुआ। बस सबसे दुखद बात रही तो वह प्रवासी मजदूरों का अपने कार्यस्थल  बड़े शहरों को छोड़कर अपने घरों को वापस जाने में आई कल्पनातीत और पीड़ादायी  परेशानियों रहीं। काश जिन राज्यों में वे कार्यरत थे उन राज्यों द्वारा उनके जीवन यापन की जरूरतों को पूरा किया जाता तो इतना बड़ा संकट उनके जीवन में ना आता।
*डॉ. हरिकृष्ण बड़ोदिया,रतलाम (म.प्र)
 

इस विशेष कॉलम पर और विचार पढ़ने के लिए देखे- लॉकडाउन से सीख 

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