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सीख
June 5, 2020 • सुनील कुमार माथुर • कहानी/लघुकथा
*सुनील कुमार माथुर
बरसात के दिन थे । एक दिन मेरे पिताजी ने हम पांचों भाइयों को बुलाया और पांचों भाइयों से एक - एक गड्डा खुदवाया और सभी भाइयों को एक - एक पौधा थमा कर कहा कि इन्हें सही ढंग से रोपें । ये पौधे केले , अनार , अमरूद, गूंदे व सीताफल के थे ।
पिताजी अब रोज हम से इन पौधों में पानी डलवाते । कभी खुरपी देने को कहते । कभी खाद डलवाते लेकिन पौधों के पास साफ - सफाई रोज कराते । इससे घर के परिसर में हर वक्त साफ सफाई रहती । धीरे-धीरे पौधे बडे होने लगे । नियमित रूप से देखरेख करने से पौधों के कारण परिसर एक पार्क के रूप में परिवर्तित होने लगा । 
साल भर बाद उन पौधों ने वृक्ष का रूप ले लिया और फल लगने लगें । इधर 5 जून यानि विश्व पर्यावरण दिवस आ गया और हमें पता भी नहीं लगा कि कब समय पंख लगाकर निकल गया और हमें अभी तक यह भी पता नहीं था कि पिताजी ने हम से ये पौधै क्यों लगवाएं ।
5 जून के दिन ही पिताजी ने हमें बताया कि बच्चों यह पौधे आप लोगों ने एक साल पहले आज ही के दिन लगाये थे और आज यह वृक्ष बनकर तुम्हारे सामने खडे है और फल से लबालब लदे हुए है । यह सब आप लोगों की मेहनत का ही परिणाम है । इतना ही नहीं आज हमारा यह परिसर हरियाली के कारण व साफ सफाई के कारण कितना सुन्दर लगता है । 
आज विश्व पर्यावरण दिवस है । आप आज अपनी मेहनत का परिणाम देख रहे है कि यह पेड कितने हरे भरे है और फलों से लदे हैं । पिताजी ने यह पंक्तियां करीब चार - पांच बार दौहराई तब जाकर हमें यह समझ में आया कि उनका इसारा इस ओर था कि जैसे बगीचे को हरा भरा बनायें रखा वैसे ही इस परिवार को संयुक्त परिवार बनायें रखना और इस बात का विशेष ध्यान रखना की इसकी एक भी डाल टूट न पायें, कमजोर न होने पायें ।
हमारे पिताजी आज भले ही इस नश्वर संसार में नहीं है लेकिन हमें संयुक्त परिवार की महत्वपूर्ण सीख पौधारोपण के बहाने दे गयें ।
*जोधपुर राजस्थान 
 

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