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संकट  का  राहू काल
March 28, 2020 • अशोक 'आनन' • कविता

*अशोक 'आनन'
 
रे  मनवा !  तू  क्यों  उदास   है ?
ये  ही  दिन  तो  बहुत  ख़ास  हैं ।
 
बाहर तो सिर्फ पतझड़ पसरा  है -
घर  के  अंदर खिला मधुमास है ।
 
सनातन धर्म ही विश्व विजयी होगा -
सबके मन में आज यही विश्वास है ।
 
देखना , डोर  कभी  नहीं  वह टूटेगी -
सबके  मन  में  जो  आज  आस  है।
 
ज़ंग जीवन की यह भी तू जीत लेगा -
उखड़ी   अभी   कहां   तेरी   सांस  है ।
 
खुशियां  क्यों  तलाशता  है  तू  बाहर -
मन में प्यार का खिला अमलतास है ।
 
पल न लगा जिसने बुझा दी जीवन ज्योत -
नाम  उस  बैरी का लेना मुझे नहीं रास  है ।
 
सूरज मानवता का यहां कभी नहीं ढला है -
एक  किरण  मानवता  की  सबके  पास है ।
 
संकट का यह राहू काल भी गुज़र जाएगा -
धर्म - संस्कृति का फैला हर ओर उजास है ।
 
तन से चाहे कितनी भी दूर हम आज हों -
मन से तो हम आज  भी पास - पास  हैं ।
 
भारत इसमें भी सबका विश्व गुरू बनेगा -
दिया  पड़ौसी  ने आज हमें  जो त्रास है ।
 
दर्द  सह  नहीं  सकते  हम आज उसका  -
चुभी  हमारे  हृदय  में आज जो फांस है ।
 
प्रभु ! हमें तू इस आपदा से शीध्र उबारना -
यही हमारी प्रार्थना , दुआ और अरदास है ।
 
दूरियां ये भी एक दिन पट जाएंगी ' आनन ' -
आपदा आई  भी  तो एक दम अनायास है ।
 
*अशोक 'आनन' मक्सी ,जिला - शाजापुर ( म. प्र .)