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समन्दर ग़मों का था मुझ में
July 12, 2020 • हरगोविंद मैथिल • गीत/गजल

*हरगोविंद मैथिल

समन्दर ग़मों का था मुझ में ।
दरिया सा बहता था मुझ में ।।
 
दर्द भी था हद से जियादा ।
मोम सा जो पिघला था मुझ में ।।
 
दर्प अना का भी था ऐसा ।
जो अब पनप रहा था मुझ में ।।
 
लोग यहांँ कहते हैं अब तक ।
कितना ज़ह्र भरा था मुझ में ।।
 
ढूंँढ़ रहा था जिसे ज़हां में ।
मैथिल  मुझे मिला था मुझ में ।।
 
*विदिशा
 

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