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समझ ना आज तक पाये
May 16, 2020 • सुषमा दिक्षित शुक्ला • कविता
*सुषमा दिक्षित शुक्ला
 
हुकूमत को तेरी कुदरत ,
समझ ना आज तक पाये
 
कहीँ इक इक निवाले को ,
बहुत से  लोग तरसे हैं ।
 
कहीँ  तो अन्न के पूरे 
भरे गोदाम  सड़ जाएं ।
 
हुकूमत को तेरी कुदरत ,
समझ ना आज तक पाये।
 
न दी औलाद  बहुतों को ,
किसी की गोद  की सूनी ।
  
कोई  सड़क पर फेंक भी आये । ,
समझ  ये  राज ना  पाये ।
 
किसी का फेंका हुआ कचरा ,
किसी  का ताज  बन जाये ।
 
कोई है  दास बन जीता,
कोई  महाराज बन जाये।
 
हुकूमत को तेरी कुदरत ,
समझ ना आज तक पाये ।

 
*सुषमा दिक्षित शुक्ला

 

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