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सच्ची मित्र हैं पुस्तकें
April 23, 2020 • श्रीराम माहेश्वरी • लेख

(विश्व पुस्तक दिवस 23 अप्रैल पर विशेष)


यह सच है कि पुस्तकें मनुष्य की सच्ची मित्र हैं। बचपन से बुढ़ापे तक पुस्तकें मनुष्य का साथ देती हैं। पुस्तकों से हमें ज्ञान मिलता है। पुस्तकों के रूप में अच्छा साहित्य हमारे जीवन का मार्ग प्रशस्त करता है। सृष्टि की उत्पत्ति के बाद इसकेे संचालन के लिए ज्ञान की आवश्यकता हुई। इस हेतु वेदों की रचना हुई। उपनिषद -पुराण बने। इनके मार्गदर्शन में आदिकाल से ही विश्व का संचालन संभव हो सका। जैसे- जैसे सभ्यता का विकास हुआ, समाज में शिक्षा की आवश्यकता महसूस हुई। शिक्षा के प्रसार और विस्तार के लिए अनेक विषयों के ग्रंथों और पुस्तकों का प्रकाशन हुआ। लाखों वर्षों से पीढियां बदलती गईं, परन्तु पुस्तकों का महत्व कभी कम नहीं हुआ। भविष्य में भी पुस्तकों का यह अमृत सागर समूची मानव जाति को सुसंस्कृत और समृद्ध करता रहेगा।
पहला ज्ञान जीव  को मां के गर्भ में मिलता है, जब उसमें प्राणतत्व प्रवेश करता है। जन्म लेने के बाद उसका शारीरिक और मानसिक विकास होता है। शिशु को समझ विकसित करने में गुरु के रूप में माता उसे ज्ञान देती है, फिर बाल्यकाल से विद्यालय में उसका परिचय पुस्तकों से होता है । ये शैक्षिक पुस्तकें  युवावस्था तक उसे सुसंस्कृत और शिक्षित करती हैं। व्यक्ति अपनी रुचि और कौशल के अनुरूप विभिन्न विषयों का अध्ययन इन्हीं पुस्तकों से करता है । पारिवारिक और जीविकोपार्जन संबंधी दायित्वों का निर्वहन करते हुए भी व्यक्ति मानसिक विकास के लिए हर आयु में पुस्तकें पढ़ता रहता है। पुस्तकों को ज्ञान का अथाह सागर कहा गया है। जैसे जैसे व्यक्ति इसमें उतरता जाता है, उसे ज्ञान की गहराई मिलती जाती है। 
विश्व के अनेक देशों में अनेक भाषाएं प्रचलित हैं।  प्रचलन के अनुसार उन भाषाओं में पुस्तकों का प्रकाशन होता है।  इसी तरह भारत के विभिन्न राज्यों में भाषाएं अलग- अलग होने के कारण अनेक भाषाओं में साहित्य का सृजन हुआ और हो रहा है। आवश्यकता और उपयोगिता के अनुसार पुस्तकों का प्रकाशन होता है।  शैक्षिक पुस्तकों के अलावा विभिन्न क्षेत्रों के ज्ञान के लिए संतों, आचार्यों, लेखकों और बुद्धिजीवियों ने अनेक पुस्तकें लिखी हैं।  
किसी भी देश का विकास और समृद्धि वहां के साहित्य से जानी जा सकती है।   भारत में पहले जब   बाहरी आक्रमणकारियों का आक्रमण हुआ और उन्होंने इस देश पर शासन किया,  तब उन्होंने सबसे पहले यहां की संस्कृति को नष्ट करना शुरू किया।  सनातन धर्म का साहित्य, ऐतिहासिक इमारतें, धार्मिक स्थल, प्राचीन धरोहर तथा भाषाओं पर उन्होंने प्रहार किया। यदि  किसी देश का साहित्य और संस्कृति  नष्ट हो जाए,  तो वहां की सभ्यता का विनाश हो जाता है। अनेक बाहरी प्रयासों के बाद भी भारत ने अपनी संस्कृति की रक्षा की।
भारत में शिक्षा के प्रसार के लिए राज्यों के जिलों में बनाए गए पुस्तकालयों में पुस्तकों का अथाह भंडार है।  अनेक भाषाओं और विषयों  में पुस्तकें उपलब्ध हैं, इसके बावजूद यहां सनातन धर्म,  वैदिक और आध्यात्मिक ज्ञान की पुस्तकों का अभाव रहा है।  पूर्ववर्ती सरकारों द्वारा इस दिशा में ध्यान नहीं दिया गया, केवल  नौकरीपरक शिक्षा की ओर ही अधिक जोर दिया गया।  इसलिए आध्यात्मिक ज्ञान और कौशल विकास की दिशा में हमारा देश पिछ्ड़ता रहा। अब ई पुस्तकों का प्रचलन बढ़ रहा है। लोगों को पुस्तकों से जोड़ने के लिए नये पुस्तकालयों का निर्माण और पुराने पुस्तकालयों के नवीनीकरण की आवश्यकता है। 
देश में उदारीकरण के बाद काफी बदलाव आया।  विभिन्न देशों में आयात- निर्यात  बाधाएं हटने के बाद बाजारवाद हर  शहर और ग्राम स्तर तक पहुंच गया। पश्चिमी देशों की भौतिकता का प्रभाव हमारे जीवन स्तर पर  पड़ा।  इसका असर हमारे साहित्य और पुस्तकों पर भी हुआ है।  हमारी संस्कृति, भाषा, कला और सामाजिक सरोकारों को सुदृढ़ करने वाला जो साहित्य हमें पहले मिलता रहा है, उसके स्तर में भी अब कमी आई है।  देश काल और परिस्थितियों का प्रभाव हमारी पुस्तकों पर भी पड़ने लगा है।  यह एक गंभीर चिंता का विषय है।  मनोरंजन के नाम पर जिस तरह  फिल्मों और टीवी के धारावाहिकों में दिखाया जा रहा है, वह हमारी संस्कृति पर गहरा आघात है।  इसे रोकने की आवश्यकता है।  इसी तरह पुस्तकों के लेखन में भी राष्ट्रीयता की भावना की  बजाय भौतिकवाद, बाजारवाद और  अलगाववाद  की काली छाया पड़ रही है। देश के लिए ये शुभ संकेत नहीं हैं। 
विश्व आज महामारी के संकट से जूझ रहा है। इस संकट ने विश्व के कई विकसित राष्ट्रों के शक्तिशाली होने के अहंकार को तोड़ा है और समूची मानव जाति की रक्षा के लिए आपस में  मिलकर साथ चलने की शिक्षा दी है। विपदा नियंत्रण में ठोस प्रयासों के लिए विश्व आज भारत की प्रशंसा कर रहा है। यह हमारे नागरिकों के धेर्य और साहस का प्रमाण  है। हमारी इस सफलता का कारण है -  संस्कार, आचरण और व्यवहार।  इसकी शिक्षा हमें पुस्तकों से ही मिली है। ।   मनुष्य के व्यक्तित्व के विकास का आधार पुस्तकें ही हैं। 
*श्रीराम माहेश्वरी, भोपाल
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
 

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