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रोजी रोटी की समस्या 
May 18, 2020 • सुनील कुमार माथुर • लेख

*सुनील कुमार माथुर
कोरोना महामारी के चलतें देश एक तरह से ठहर सा गया है । देश की आर्थिक स्थिति डावांडोल हो गयी है । सभी कारोबार  , कल कारखाने  , सरकारी व निजी दफ्तर व प्रतिष्ठान बंद पडें है । करीब  दो माह हो गये काम धंधे बंद होने से श्रमिकों के समक्ष रोजी-रोटी की समस्या पैदा हो गयी है । लाॅक डाउन के चलते उनकी जमा पूंजी सारी खत्म हो गयी है । खाने की समस्या एक की हो तो सोचे भी  लेकिन यहां तो पूरा परिवार एक व्यक्ति पर निर्भर है ।
लाॅक डाउन की जिस सभय घोषणा हुई थी उस वक्त प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने घोषणा की थी कि कोई भी व्यक्ति भूखा न सोए और जहां वह कार्यरत है वहां से उसे हटाया नहीं जायेगा और मालिक श्रमिकों को घर बैठे वेतन देगे लेकिन उस वक्त किसी ने भी इस बात का विरोध नहीं किया था कि जब हमारी दुकानें, प्रतिष्ठान व कल कारखाने बंद रहेंगे, उत्पादन ठप रहेगा तब हम कैसे श्रमिकों को घर बैठे भुगतान करेंगे ।
इधर श्रमिक भरोसे में रह गयें और अपने-अपने घरों को नहीं गयें लेकिन दो माह में उन्हें तनिक भी राहत नहीं मिली तो वे घबराये और अपने-अपने घरों को लौटने लगें । कल तक जो श्रमिक अपनी मेहनत से कमाई कर घर परिवार को पाल रहा था और मजे से दाल रोटी  , दाल बाटी खा रहें थे आज उन्हें एक वक्त की रोटी नहीं मिल रही हैं ।
मालिकों ने श्रमिकों को ढेंगा दिखा दिया । वहीं दूसरी ओर मकान मालिक किराया मांगने लगा । बीबी - बच्चों को वह भूख से तडफते न देख सका और पलायन करने लगें । दुख तब होता है कि जिन मजदूरों के बलबूते पर मालिकों ने अपने आलीशान भवन खडे किये , अपने कारोबार को इतनी ऊंचाइयों तक पहुंचाया, आलीशान गाडियां खरीदी , धन दौलत कमाई वे ही आज इस महामारी में उनकी मदद करना तो दूर उन्हें अपने ही हाल पर अकेला छोड दिया । क्या यही मानवता है ? क्या हमारे यहीं संस्कार हैं  ? 
अगर हर प्रतिष्ठान का मालिक आगें आकर अपने यहां कार्यरत श्रमिकों के परिजनों की दो वक्त की रोटी की व्यवस्था करतें तो वे सही मायने में सच्चे भामाशाह होते और समाज को ही नहीं अपितु समूचे राष्ट्र को गर्व होता । लेकिन इसमें मीडिया भी पीछे नहीं रहा । विज्ञापनों के चक्कर में उसने जमकर पैसे वालों की खूब तारीफ की । उनके परिजनों के सभी सदस्यों के नाम प्रकाशित कर सस्ती लोकप्रियता हासिल करने में पीछे नहीं रहा चूंकि मीडिया का ध्येय यही रहा मस्का लगाओं धन कमाओं । लेकिन आज ऐसे भी मीडिया कर्मी है जो चार - चार , पांच- पांच महिनों से वेतन के लिए तरस रहें है उनका घर कैसे चल रहा है इसकी सुध लेने वाला कोई नहीं है ।
अगर श्रमिकों को दो तीन महिने घर बैठे भुगतान कर देते तो ये श्रमिक पलायन नहीं करते और न ही प्रतिष्ठान का मालिक गरीब होता  । जो व्यक्ति दुःख में भी काम न आयें ऐसे प्रतिष्ठान में नौकरी करना मात्र पेट भराई है वहां मालिक श्रमिक का कोई रिश्ता नहीं रहता है चूंकि वह अपनी मेहनत की कमाई की खा रहा है न कि किसी कि दया पर पल रहा है जो अपने श्रमिकों के हितों की रक्षा न कर सकें वे कैसे उघोगपति है  ? 
 
*सुनील कुमार माथुर, जोधपुर राजस्थान 
 

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