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रेतीली नदियां
March 18, 2020 • अशोक ' आनन ' • गीत/गजल

       
*अशोक ' आनन ' 
 
ग्रीष्म अंगीठी -
सुलगे अंगारे ।
 
झिलमिल करतीं -
रेतीली नदियां ।
जिनसे चुंधियातीं -
सूखी अंखियां ।
 
नैनों में -
धूल भरे गुब्बारे ।
 
बेड़ियों से जकड़ी -
अब हवाएं ।
लू  की  लपटें  - 
हरियाली  जलाएं ।
 
गर्मी  -
किरणों की बेंतें मारे !
 
गांव - शहर -
सन्नाटों के मेले ।
दिन भर बहते -
पसीने के रेले ।
 
उमस की पिनें-
चुभें शाम - सकारे ।
 
कलरव आतंकित -
डरा - डरा - सा ।
सुकून बचा न -
कहीं ज़रा - सा ।
 
पानी - पानी अब-
जल - कंठ पुकारें ।
 
*अशोक ' आनन ' 
मक्सी जिला - शाजापुर ( म. प्र.)

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