ALL कविता लेख गीत/गजल समाचार कहानी/लघुकथा समीक्षा/पुस्तक चर्चा दोहा/छंद/हायकु व्यंग्य विडियो
रणबांकुरे
November 7, 2019 • माया मालवेन्द्र बदेका • गीत/गजल

*माया मालवेन्द्र बदेका*
जंजीरों में बंधकर भी वह ,जी भर कर मुस्काये थे।
देश पर बलिदान होकर, मन में बहुत हरषाये थे।
 
मां,बहन, बेटी उनसे, बिछुड़ने की नही पीर थी।
वह भी रांझा  किसी के,उनकी भी कोई हीर थी।
पर देशप्रेम की बंधी ,उनके मन में कड़ी जंजीर थी।
ऐसे वीर सपूत मीटे देश पर, वीरांगना के जाये थे।
जंजीरों में बंधकर भी वह ,जी भर कर मुस्काये थे।
देश पर बलिदान होकर, मन में बहुत हरषाये थे।
 
दीपावली के दीप जले,होली की कहीं अबीर थी।
वीर बांकुरे मिले देश को,भारत की तकदीर थी।
आजाद देश की शान बने वह, ऐसी तस्वीर थी।
हमारे लिए बदन पर उनने, अनगिनत कोड़े खाये थे।
जंजीरों में बंधकर भी वह ,जी भर कर मुस्काये थे।
देश पर बलिदान होकर, मन में बहुत हरषाये थे।
 
*माया मालवेन्द्र बदेका,७४_अलखधाम नगर,उज्जैन (मध्यप्रदेश)
 

शब्द प्रवाह में प्रकाशित आलेख/रचना/समाचार पर आपकी महत्वपूर्ण प्रतिक्रिया का स्वागत है-

अपने विचार भेजने के लिए मेल करे- shabdpravah.ujjain@gmail.com

या whatsapp करे 09406649733