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राष्ट्रगीत के प्रणेता और बंग साहित्य के अग्रदूत - बंकिमचन्द्र
June 29, 2020 • नवीन गौतम • लेख
 
*नवीन गौतम
बंगाल की पावन भूमि राष्ट्रीय स्वतन्त्रता आंदोलन के नायकों , आदर्शों की ही नहीं अपितु महान साहित्यकारों की भी जननी है । राजाराम मोहन राय , ईश्वरचन्द्र विद्यासागर , रवीन्द्रनाथ टैगोर , शरदचंद्र चटोपाध्याय जैसी शख्सियत इसी धरा पर जन्मी हैं जिन्होंने न केवल देश के सामाजिक , धार्मिक , सांस्कृतिक , राष्ट्रीय पुनरुत्थान में अपना योगदान दिया बल्कि साहित्य के क्षेत्र में भी उनका अवदान कालजयी है । 19 वीं शताब्दी में जहाँ बंगाल में साहित्य अंग्रेजी और संस्कृत भाषा पर आधारित होता जा रहा था वहीं पर साहित्य के क्षेत्र में एक ऐसी धारा का प्रस्फुटन हुआ जिसने बांग्ला साहित्य का उद्घोष किया और वह वैचारिक धारा थी बंकिमचन्द्र चटर्जी की लेखनी की धारा ।
 
बंकिमचन्द्र को बंग साहित्य के अग्रदूत और जनक के रूप में जाना जाता है । वे महान लेखक होने के साथ साथ कवि और पत्रकार भी थे । भारत के राष्ट्रगीत "वन्दे मातरम" को सालों पहले उन्हीं के द्वारा लिखा गया था । उनका जन्म 27 जून सन 1838 को बंगाल के नैहाटी जिले के कांठलपाड़ा नामक गाँव में एक रूढ़िवादी बंगाली ब्राह्मण परिवार में हुआ था । उनकी माता का नाम दुर्गादेवी और पिता का नाम यादव चन्द्र चटोपाध्याय था । उनकी शिक्षा बंगाल के हुगली कॉलेज और प्रेसिडेंसी कॉलेज में हुई । बचपन से ही उनकी रूचि संस्कृत के प्रति अधिक थी ।
एक प्रसंगानुसार कहा जाता है कि एक बार अंग्रेजी अध्यापक द्वारा डाँटने पर उनकी अँग्रेजी के प्रति रुचि खत्म हो गई थी । पढ़ाई के साथ साथ खेलकूद के भी शौक़ीन थे ।मेधावी और मेहनती बंकिमचंद्र प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के समय सन 1857 में  बी ए उत्तीर्ण करने वाले वे पहले भारतीय थे । इनका पूरा परिवार शिक्षित और सम्पन्न था । पिता मिदनापुर में उप कलेक्टर पद पर सरकारी सेवा में थे अतः उनकी आज्ञा मानते हुए शिक्षा पूर्ण होने के बाद डिप्टी मजिस्ट्रेट का पद ग्रहण किया । कुछ समय तक वे बंगाल सरकार के सचिव पद पर भी रहे और रायबहादुर व सी.आई.आई. की उपाधियों से भी नवाजा गया । सरकारी नौकरी में रहकर भी वे अंग्रेजों से दबते नहीं थे क्योंकि स्वदेश और स्वभाषा प्रेम उनमें कूट कूट कर भरा हुआ था और 1857 के गदर को देखा था जो उनके अंदर क्रांति की ज्वाला जगा रहा था । 11 वर्ष की आयु में सन 1849 में उनका विवाह हो गया था तब उनकी पत्नी की उम्र महज 5 वर्ष थी । विवाह के 11 वर्ष बाद सन 1860 में पत्नी की मृत्यु हो जाने पर राजलक्ष्मी देवी से दूसरा विवाह किया । इनके तीन बेटियाँ थी ।
सरकारी पद पर होने के कारण सार्वजनिक आंदोलनों में वे प्रत्यक्ष रूप से भाग नहीं ले सकते थे और न ही अंग्रेजों का खुलकर विरोध कर सकते थे ।लेकिन अंग्रेजों के प्रति रोष और आक्रोश मन ही मन बढ़ता जा रहा था इसलिए साहित्य के माध्यम से जागृति लाने का निश्चय किया । सन 1869 में उन्होंने कानून की डिग्री भी हासिल कर ली थी । इसके बाद उन्होंने सरकारी नौकरी कर ली थी जिससे वे सन 1891 में सेवानिवृत्त हुए । बंकिमचन्द्र का रवीन्द्रनाथ टैगोर के पूर्ववर्ती साहित्यकारों में अन्यतम स्थान रहा है । वे बंग साहित्य के भगीरथ कहलाते हैं । बंग्ला साहित्य में उनकी जनमानस तक गहरी पैठ थी । ईश्वरचन्द्र गुप्ता उनके आदर्श थे जिनके साथ वे "संगभा प्रभाकर" नामक साप्ताहिक समाचार पत्र में लिखा करते थे । उनकी पहली कृति "राज मोहन्स वाइफ" थी जो अंग्रेजी में होने के कारण ज्यादा पसंद नहीं की गई । तब उन्होंने वहाँ की क्षेत्रीय भाषा में लिखना उचित समझा ।  27 वर्ष की उम्र में सन 1865 में उन्होंने बंगाली भाषा में प्रेम कहानी पर आधारित पहला उपन्यास "दुर्गेशनंदिनी" लिखा और प्रकाशित करवाया था । इसके बाद सन 1866 में प्रकाशित हुए "कपालकुंडला" ने उन्हें एक लेखक के रूप में स्थापित किया ।  सन 1869 में ऐतिहासिक सन्दर्भ में "मृणालिनी" उपन्यास लिखा । सन 1872 में "बंग दर्शन" नामक अपनी मासिक पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया जिसमें उन्होंने गम्भीर साहित्यिक-सामाजिक और सांस्कृतिक मुद्दों को उठाया । इस पत्रिका में सन 1873 में उन्होंने  "विषवृक्ष" उपन्यास का क्रमिक प्रकाशन करवाया । इस पत्रिका का प्रकाशन 4 वर्ष तक चला । रवीन्द्रनाथ टैगोर "बंग दर्शन में लिखकर ही साहित्य के क्षेत्र में आये और बंकिमचंद्र को अपना गुरु माना । 
सन 1877 में "चन्द्रशेखर" नामक उपन्यास लिखा जो अब तक की शैलियों से बिल्कुल अलग शैली में था । इसी वर्ष "रजनी" उपन्यास का भी प्रकाशन किया जिसे बंकिमचंद्र की आत्मकथा भी कहा जाता है ।  सन 1882 में "आनन्दमठ" उपन्यास लिखा जिसने उन्हें प्रसिद्घि दिलाई । सन 1886 में प्रकाशित "सीताराम"  उपन्यास उनका अंतिम उपन्यास था । इसके अलावा "राधारानी , कृष्ण कांतेयर विल , देवी चौधरानी , लोक रहस्य , विज्ञान रहस्य , धर्म तत्व , कमलकांत का रोजनामचा" आदि प्रमुख कृतियों की भी रचना की थी । लेकिन आनन्दमठ ने उन्हें जो पहचान दिलाई वो अन्यतम थी । यह एक राजनीतिक उपन्यास था जो सन 1772 में पूर्णिया , दानापुर तिरहुत में अंग्रेजों और स्थानीय मुस्लिम राजाओं के खिलाफ हुए हिन्दू सन्यासियों के विद्रोह की घटना पर आधारित था ।
जब अंग्रेज सरकार ने "गॉड ! सेव द क्वीन" गीत को हर समारोह में गाना अनिवार्य कर दिया था तब इससे आहत होकर सन 1874 में राष्ट्रगीत "वन्दे मातरम" की रचना की जिसे 1875 में बंग दर्शन पत्रिका में प्रकाशित किया लेकिन बाद में इसे  "आनन्दमठ" में शामिल किया गया । यह गीत चार छंदों में लिखा गया जिसके शुरू के दो छंद संस्कृत में और बाद के दो छंद बांग्ला में हैं । ऐतिहासिक और सामाजिक ताने बाने पर आधारित इस उपन्यास ने देश में राष्ट्रीयता की भावना जागृत करने में बहुत योगदान दिया । वन्दे मातरम गीत ने मंत्र की तरह सम्पूर्ण स्वतंत्रता संग्राम को नई चेतना से भर दिया था और यह क्रांतिकारियों का प्रेरणास्रोत बन गया था । इस गीत को पहली बार सन 1896 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में गाया गया था । इस गीत से प्रेरित होकर सन 1906 में विपिनचन्द्र पाल ने "वन्देमातरम" नाम से देशभक्ति पत्रिका शुरू की थी । लाला लाजपतराय ने भी इसी नाम से एक राष्ट्रवादी पत्रिका प्रकाशित की थी । रवीन्द्रनाथ टैगोर ने इस गीत की धुन तैयार की थी और उन्हीं की प्रेरणा से सन 1937 में ही इसे राष्ट्रीय गीत के रूप में तत्कालीन राष्ट्र नायकों ने स्वीकार कर लिया था ।
वन्देमातरम भगतसिंह , रामप्रसाद बिस्मिल , चंद्रशेखर आजाद , प्रफुल्ल चाकी , खुदीराम बोस जैसे महान देशभक्तों की रग रग में बसा हुआ था । जब संविधान का निर्माण हो रहा था तब मुस्लिम लीग और मुसलमानों ने वन्देमातरम का इस वजह से विरोध करना शुरू कर दिया था कि इस गीत में भारतमाता को दुर्गा माँ का प्रतीक माना गया है और वे देश को भगवान का रूप देकर पूजा करने के खिलाफ थे । लेकिन अंततः सभी की सहमति से वन्देमातरम गीत के शुरू के दो छंदों को विधिवत रूप से स्वीकार कर लिया गया और इसे 24 जनवरी सन 1950 को संविधान में राष्ट्रगीत का दर्जा दिया गया जिसकी घोषणा संविधान सभा के अध्यक्ष और भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने की थी । 

बंकिमचंद्र के अवदान के बारे में रवीन्द्रनाथ टैगोर लिखते हैं कि "राममोहन ने बंग साहित्य को निमज्जन दशा से उन्नत किया ,बंकिम ने उसके ऊपर प्रतिभा प्रवाहित करके स्तरबद्ध मूर्ति का अपसरित कर दी । बंकिम के कारण ही आज बंग भाषा प्रौढ़ ही नहीं , उर्वरा और शस्य श्यामला भी हो सकी है ।" बंकिमचंद्र के उपन्यासों का भारत की लगभग सभी भाषाओं में अनुवाद हुआ है और राष्ट्रगीत वन्देमातरम विश्व का दूसरा सबसे लोकप्रिय गीत है । इसलिए लोकप्रियता के मामले में वे रवीन्द्रनाथ टैगोर से भी आगे रहे । उनकी कृतियों के पात्र और कथानक मध्यम वर्ग की त्रासदियों का विवेचन करते हैं । राष्ट्रगीत के प्रणेता , बंग साहित्य के भगीरथ और अग्रदूत तथा भारत के एलेक्जेंडर ड्यूमा बंकिमचंद्र का कोलकाता ( बंगाल ) में 08 अप्रेल सन 1894 को निधन हुआ जो राष्ट्र के लिए ही नहीं अपितु साहित्य के लिए भी अपूरणीय क्षति थी । 

*कोटा - राजस्थान
 

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