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राष्ट्र निर्माता और युगदृष्टा, चाचा नेहरू
November 11, 2019 • डॉ अरविन्द जैन • लेख

*डॉ अरविन्द जैन*
पंडित नेहरू जी को उनके विचारधारा से विरोधी उन्हें हमेशा असफल व्यक्तित्व के रूप में प्रतिस्थापित किया हैं पर यब बात जरूर हैं की जो भी वर्तमान में भारत की उन्नति और विकास के मूल में उनकी सोच का ही प्रतिफल हैं जिसे भुलाया जाना संभव नहीं हैं .वर्तमान में जो शासक हैं उनके जन्म से पहले उन युगद्रष्टा ने उज्जवल भारत के निर्माण में जो नींव रखी थी उसी को आधार बनाकर ही देश विकसित हुआ.
14नवम्बर बाल दिवस के रूप में मनाने का औचित्य यह है कि पं. जवाहरलाल नेहरू बच्चों को देश का भविष्य मानते थे। उनकी यह अवधारणा सौ फीसदी सत्य है, क्योंकि आज जन्मा शिशु भविष्य में राजनीतिज्ञ, वैज्ञानिक, लेखक, शिक्षक, चिकित्सक, इंजीनियर या मजदूर कुछ भी बने आखिर राष्ट्र निर्माण का भवन इन्हीं की नींव पर खड़ा होता है।
पं. नेहरू प्रौढ़ और युवाओं की तुलना में ज्यादा स्नेह और महत्व बच्चों को दिया करते थे। इसी भावना को समझते हुए समाज ने उन्हें चाचा नेहरू की उपाधि से विभूषित किया। इसलिए आज भी 14 नवंबर का दिन बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है। पं. नेहरू यूं  तो सारे जहान के गुण अपने अंतर्मन में समेटे हुए थे, राष्ट्र निर्माण की भावना, विश्व बंधुत्व की लालसा, अहिंसा एवं समाजवाद की अविरल धारा बहाने का भी उन्होंने पुरजोर प्रयास किया था।
सदियों की गुलामी के बाद जब देश को आजादी मिली तो आजादी के प्रथम दिन से ही देश की बागडोर अपने कर्मठ हाथों में संभाल ली। उनके राजनीतिक हाथ इतने मजबूत और सशक्त थे कि भारतीय जनता ने उनकी शासन करने की क्षमता को सराहा और पसंद किया। सत्तारूपी देवी ने उनसे प्रधानमंत्री की कुर्सी कभी नहीं छीनी, बल्कि जिंदगी ने ही उनका दामन छोड़ दिया। वे 13 वर्ष की उम्र में ही थियोसॉफिकल सोसायटी के सदस्य बने। 15 वर्ष की उम्र में पंडितजी ने हेरो स्कूल और ट्रिनिटी कॉलेज में अपनी शिक्षा पूर्ण की।
चौदह नवंबर बाल दिवस के रूप में मनाने का औचित्य यह है कि पं. जवाहरलाल नेहरू बच्चों को देश का भविष्य मानते थे। उनकी यह अवधारणा सौ फीसदी सत्य है, क्योंकि आज जन्मा शिशु भविष्य में राजनीतिज्ञ, वैज्ञानिक, लेखक, शिक्षक, चिकित्सक, इंजीनियर कुछ भी बन सकता है
वहां से लौटकर सन्‌ 1918 में उन्हें होमरूल  लीग का सचिव चुन लिया गया। कुछ समय बाद ही उन्हें इंडियन नेशनल कांग्रेस का अध्यक्ष बना दिया गया। इस स्वर्णकाल में उन्होंने देश में पंचवर्षीय योजनाओं को क्रियान्वित करवाकर जनमानस को राजनीतिक, सांस्कृतिक और आर्थिक ठहराव के दलदल से बाहर निकाला और देश की तरक्की के नए आयाम स्थापित किए।
उन्होंने देश से बाहर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की पताका फहराने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। उन्होंने उपनिवेशवाद, नव उपनिवेशवाद, साम्राज्यवाद, रंगभेद और अन्य कई प्रकार के भेदभावों को दूर करने के लिए विश्व के तमाम देशों को औपनिवेशिक शासन से मुक्त कराने का श्रेय प्राप्त किया।
पंचशील सिद्धांतों को लागू करवाकर विश्व के देशों में शांति और सद्भावना स्थापित करने में उनका अपूर्व योगदान था। नेहरूजी राजनीतिक, समाजिक एवं आर्थिक चिंतक होने के अतिरिक्त एक उच्चकोटि के लेखक थे, जिन्होंने दो पुस्तकें (1) डिस्कवरी ऑफ इंडिया और (2) ग्लिम्पसेज ऑफ वर्ल्ड हिस्ट्री लिखी, जो कि विश्व प्रसिद्ध हैं। पं. नेहरू बच्चों के प्रिय चाचा होने के साथ-साथ एक सफल राजनीतिज्ञ, अर्थशास्त्री, चिंतक-साहित्यकार थे।
बच्चों में संस्कारों का विकास हमेशा अपने से बड़ों को देखकर ही होता है इसलिए अपने आचरण को सही रखना भी उतना ही जरूरी है जितना बच्चे पर ध्यान देना। कहते हैं न 'अगर ठीक से खाद डाली जाए, तो पौधा बहुत सुंदर होता है' और संस्कार उसी खाद का काम करते हैं।
आपाधापी वाले समय में बाल दिवस हमें मौका देता है कि हम कुछ सोचें अपने बच्चों के बारे में, उनकी परवरिश के बारे में। अक्सर देखा गया है कि किसी बच्चे की खराब आदतों को देखकर लोग फब्तियां कसते हैं कि इस बच्चे को अच्छे संस्कार नहीं मिले। क्या संस्कारों को जबरन किसी बच्चे पर थोपा जा सकता है या कॉपी-पेन लेकर यह संस्कार उन्हें रटाए जा सकते हैं?
जब बच्चा चीजों को जानने और समझने लगता है तभी से उसमें आदतों को विकास शुरू हो जाता है। ऐसे में इस बात का ध्यान जरूर रखा जाए कि कहीं लाड़-प्यार में आप अपने बच्चों को संस्कारों से दूर तो नहीं कर रहे।
बच्चे की सही परवरिश हो इसके लिए कुछ बातों पर ध्यान देना जरूरी है : -
लोग अपने बच्चों को हर चीज उपलब्ध करवाने की जिद में उनकी हर जायज व नाजायज मांग को पूरा कर देते हैं, जिससे उनमें हर कीमत पर कुछ भी पाने की प्रवृत्ति का विकास होता है। ऐसा करते समय माता-पिता यह नहीं सोचते कि वे अपने बच्चे को सिर्फ लेना सिखा रहे हैं, देना नहीं।
अपने बच्चों की गतिविधियों पर नजर रखें। आज के व्यस्त जीवन में जहां माता-पिता दोनों ही कामकाजी हैं, बच्चों की हर एक गतिविधि पर पूरा ध्यान दे पाना थोड़ा मु‍श्किल हो जाता है। चाहे आप काम के सिलसिले में बाहर रहें या घर पर, बच्चों को मनमानी करने से हमेशा रोकें या उनमें यह आदत डालें कि वे आपकी सहमति से ही कोई काम करें।
तकनीक में घुल रहा है बचपन। आज के बच्चे सारे काम अंगुलियों के इशारे पर करते हैं मसलन प्लेयर पर गाने सुनना, कम्प्यूटर पर गेम खेलना, टीवी देखना, फेसबुक चलाना, व्हाट्‍स ऐप आदि। आजकल तो बच्चों का सारा समय इंटरनेट पर ही गुजरता है। वे नहीं समझते क्या गलत है और क्या सही। वे तो वही सीखते हैं जो उन्हें दिखाई देता है। इसलिए बच्चों के हाथ में तकनीकी खिलौना देने के साथ ही समझाइश भी बहुत जरूरी है।
सबसे महत्वपूर्ण है अपने बच्चे को समझना और उसके नजरिए से चीजों को देखना। अपने बच्चों से उनके काम, दोस्तों आदि के बारे में हमेशा बातें करते रहें। कम्युनिकेशन गेप सारी चीजें खराब कर सकता है। जब आप उनके नजरिए से चीजों को देखेंगे तभी उनकी भाषा में उन्हें समझा पाएंगे।
बालक देश की बुनियाद हैं ,वे कच्ची मिटटी जैसे होते हैं उन्हें जैसा मोड़ना चाहो मुड़जाते हैं .इसी समय उनमे जैसे संस्कार का बीजारोपण किया जाता हैं वैसे हे उनको निर्माण होता हैं ,इसीलिए ये बच्चे नीव हैं देश के विकास की बशर्ते उन्हें सही  मार्गदर्शन की जरुरत हैं .युगानुरूप उनमे तकनिकी ज्ञान की समझ पैदा करना होगा .
*डॉक्टर अरविन्द प्रेमचंद जैन, संरक्षक शाकाहार परिषद् A2 /104  पेसिफिक ब्लू, नियर डी मार्ट,  होशंगाबाद रोड, भोपाल 462026  मोबाइल 09425006753
 

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