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राखी का त्यौहार
August 2, 2020 • ✍️संजय वर्मा'दृष्टि' • कविता
✍️संजय वर्मा'दृष्टि'
कभी चिट्ठियां घर को आती
अक्षरों को आंसू से फैला जाती
फैले अक्षरों की पहचान
ससुराल के निर्वहन को बतलाती।
 
पिता की अनुपस्थिति में
भाई लाने का फर्ज निभाता
तो कभी ना आने पर
वही राखी बंधवाता।
 
बिदा लेते समय
बहना की आँखे 
आंसू से भर जाती
भाई की आँखें
बया नही करती बिदाई।
 
सिसकियों के स्वर को
वो हार्न में दबा जाता
राखी का त्यौहार पर
भाई बहन के घर जाता।
 
रेशम की डोर में होती ताकत
संवेदनाओं को बांध कर
बहन के सुख के साथ
रक्षा के सपने संजो जाता।
 
*मनावर(धार)
 

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