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पुत्र का ख़त माँ के नाम
May 15, 2020 • डॉ वर्षा सिंह • कविता
*डॉ वर्षा सिंह
 
भागदौड़ के इस जीवन में, बचपन पीछे रह जाता
मातु गोद में सोने का सुख, पर भूल नहीं मैं पाता ।
 
मेरे बचपन की शैतानी,  माँ को थी बहुत सताती
नटखट रूप याद कर मेरा, माँ मन ही मन मुस्काती ।
 
दुख में विचलित होने पर अब, न कोई मुझे सहलाता
पर मेरे अश्रु देख निकलते, दिल माँ का निकला जाता I
 
झगड़े मोल मेरे लिए माँ, दुनिया से सारे लेती 
मेरी बलईया ले, मुझको,  वो आंचल से ढ़क  देती ।
 
बुरी नज़र दुनिया की मेरा , नहीं अमंगल कर   पाती
काला टीका माथे पर माँ, जब मुझको एक लगाती।
 
सुरक्षा कवच दुआएँ माँ की,  फिर मुझसे तो काल डरे
वार के मुझ पे चंद सिक्के , मैया  सारे कष्ट हरे ।
 
माँ ने अपनी खुशी त्याग के , आज को मेरे सँवारा
बन पतवार मेरी नाव को, बस माँ ने पार उतारा।
 
*डॉ वर्षा सिंह,मुंबई
 

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