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पुस्तकें
April 24, 2020 • अशोक 'आनन'  • कविता

    *अशोक 'आनन' 
 
   पुस्तकालयों की अलमारियों में 
   सजी - संवरी 
   बड़े क़रीने से जमी हुईं
   पुस्तकों को देख 
   बच्चों के मन में ख़्याल आता है -
 
   काश ! उन्हें मिली होतीं
   पढ़ने के लिए वे पुस्तकें 
   जिन्हें पढ़कर
   उन्होंने सीखी होतीं
   ज्ञान की कुछ बातें ।
   संवारा होता -
   अपना जीवन ।
   
   पुस्तकें -
   जिन्हें बड़ी मुश्किल से मिलता है
   आज कोई पाठक ।
  
   ऐसे में -
   उन्हें अलमारियों में कैद कर
   बना देना कोई सजावटी वस्तु 
   कहां की बुद्धिमानी है ..... ?
   
   वे भी हमारी तरह 
   खुली हवा में 
   लेना चाहती हैं सांसें 
   बनाकर 
   अपने पाठकों से
   पठनीयता का एक आत्मीय रिश्ता ।
  
   पुस्तकें -
   जिनका दम घुटता है 
   बंद अलमारियों में ।
  
*अशोक 'आनन',मक्सी ,जिला - शाजापुर ( म.प्र.)
 
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