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पुस्तकें महकती हैं....
April 23, 2020 • पुष्पा सिंघी • कविता

*पुष्पा सिंघी , कटक

अनमनी साँझ
हवा के झोंके संग
नथुनों में समा गयी
चिर-परिचित गंध...!

मैंने देखा ~
पुरानी अलमारी का
अधखुला कपाट
जहाँ से झाँक रही
छोटी-बड़ी पुस्तकें...!

काँपते हाथों से
एक पुस्तक निकाली
पीले पन्ने पलटे
हँस पड़े आखर...!

समय-चक्र में
शब्द-भाव न बदले
मैं भी कहाँ बदली
अनकहा अर्थ समर्थ...!

सच !
हर युग में
पुस्तकें महकती हैं....!!

*पुष्पा सिंघी , कटक

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