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प्रेम और त्यागपूर्ण जीवन जीने से बनती है औरों के दिल में जगह
October 10, 2020 • ✍️मुनि ललितप्रभ • समाचार
इंदौर। राष्ट्रसंत महोपाध्याय ललितप्रभ सागर महाराज ने कहा कि गोरा रंग दो दिन अच्छा लगता है, ज्यादा धन दो महिने अच्छा लगता है, पर अच्छा व्यक्तित्व जीवनभर अच्छा लगता है। अगर हम सुंदर हैं तो इसमें खास बात नहीं है, क्योंकि यह माता-पिता की देन है, पर अगर हमारा जीवन सुंदर है तो समझना यह खुद की देन है। उन्होंने कहा कि शरीर को ज्यादा मत संवारो उसे तो मिट्टी में मिल जाना है, संवारना है तो अपनी आत्मा को संवारो क्योंकि उसे ईश्वर के घर जाना है। उन्होंने कहा कि इस दुनिया में कुछ लोग बिना मरे मर जाते हैं, पर कुछ लोग ऐसे होते हैं जो अपने व्यक्तित्व एवं कृतित्व के चलते मरने के बाद भी अमर हो जाते हैं। हम या तो सौ किताबें लिखकर जाएँ ताकि हमारे जाने के बाद भी लोग हमें पढ़कर याद कर सके या फिर ऐसा जीवन जीकर जाएँ कि हम पर सौ किताबें लिखी जा सके।
संत ललितप्रभ शनिवार को एरोड्राम रोड स्थित महावीर बाग में सोश्यलमीडिया एवं टीवी चैनल पर श्रद्धालुओं को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि राम, कृष्ण, महावीर, बुद्ध जैसे लोग धरती से कभी के चले गए, पर उनके महान जीवन और महान विचारों की खुशबू आज भी लोगों को सुवासित कर रही है। औरों के दिल में जगह वैभवपूर्ण जीवन जीने से नहीं, प्रेम और त्यागपूर्ण जीवन जीने से बना करती है। याद रखें, दुनिया में वैभव महान होता है, पर त्याग और सादगी से ज्यादा कभी महान नहीं होता। उन्होंने अमीर लोगों से कहा कि अगर आप अपनी संतानों की वैभवपूर्ण शादी करेंगे तो दुनिया चार दिन याद रखेगी, पर उसके उपलक्ष में बीस गरीब भाइयों को पाँवों पर खड़ा करने का सौभाग्य लेंगे तो दुनिया हमेशा याद रखेगी। अगर आप अपना धन केवल बेटे-बेटी को देकर जाएँगे तो केवल दो जने ही खुश होंगे, पर अनाथालय, वृद्धाश्रम, स्कूल, हॉस्पिटल जैसा कोई सत्कर्म कर देंगे तो सारा शहर खुश हो जाएगा।
व्यक्तित्व को प्रभावी बनाने का पहला गुर देते हुए संतप्रवर ने कहा कि अहंकार शूल है और विनम्रता फूल है। हम केवल बड़े न बनें, वरन् बड़प्पन भी दिखाएँ। याद रखें, जो घड़ा झुकने को तैयार नहीं होता, वह कभी भर नहींं पाता। उन्होंने कहा कि हम कितने ही धनवान, रूपवान, ज्ञानवान, बलवान, सत्तावान क्यों न हों, जिंदगी का अंतिम परिणाम तो केवल दो मुठ्ठी राख ही है फिर हम किस बात का अहंकार करें।
संतप्रवर ने कहा कि जीवन में सबको प्रणाम करने की आदत डालिए। प्रणाम करने से औरों के दिल में जगह बनती है, यश बढ़ता है और चेहरा खिल जाता है। जब भी हमें कुछ मिलता है तो प्रणाम करने से मिलता है, आशीर्वाद देने से नहीं। उन्होंने अभिभावकों से कहा कि जिस घर में प्रणाम करने के संस्कार हैं उस घर में आप अपनी बेटी आँख बंद करके दे दो, वह वहाँ सदा सुखी रहेगी। जो संतानें सुबह उठकर अपने माता-पिता, बड़े-बुजुर्गों के सामने प्रणाम में घुटने टिका देते हैं, उन्हें फिर जिंदगी में कभी घुटने टिकाने की नौबत नहीं आती है।
व्यक्तित्व को प्रभावी बनाने का दूसरा गुर देते हुए संतप्रवर ने कहा कि प्रेम और उदारता भरा जीवन जिएँ। हम औरों का खाकर नहीं, वरन् औरों को खिलाकर खुश होवें। उन्होंने बहुओं से कहा कि पीहर से कुछ सामान आए तो उसे अलमारी रखने की बजाय घर के आंगन में रखें। अंदर रखने वाली अलमारी की मालकिन बनती है और आंगन में रखने वाली पूरे घर की मालकिन बनती है। उन्होंने सासुओं से कहा कि अगर कभी बहू के सिर से पल्लू खिसक जाए तो माथा भारी करने की बजाय उसमें बेटी को देखने का आनंद ले लें। दूसरा उदाहरण देते हुए संतप्रवर ने कहा कि अगर आपके घर में आपकी बेटी परदेश से आने वाली हो और दूसरी तरफ बहू के पीहर में उसका भाई परदेश से आने वाला हो तो बहू को जाने से रोकना मत, वरन् आगे रहकर उसे पीहर जाने के लिए कह देना, आपका यह बड़प्पन भरा व्यवहार बहू को जिंदगी भर याद रहेगा। उन्होंने देवरानियों से कहा कि आपकी जेठानी आपकी डिलीवरी के समय भले ही काम न आई, पर आप जेठानी की डिलीवरी के समय जरूर काम आ जाना। आपकी ओर से किया गया यह मधुर व्यवहार उसे जीवनभर के लिए सीख दे देगा। प्रवचन समारोह का शुभारंभ लाभार्थी श्री दीपचंद जी, लोकेश जी , राहुल कटारिया परिवार ने दीपप्रज्वल के साथ किया।

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