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प्रसन्नता का राज़
June 21, 2020 • अ कीर्ति वर्द्धन • कविता

*अ कीर्ति वर्द्धन

उम्र क्या है
कुछ गिनतियों का खेल
अथवा
जिम्मेदारी का अहसास
इस विवाद मे नही पडता
अपितु, प्रयास करता हूँ
प्रत्येक उम्र में
संतुष्ट रहने का
जिससे
बच जाता हूँ
अनावश्यक तनाव से
और रह पाता हूँ
सदैव प्रसन्न।
बडे होते बच्चों को
सौंपकर जिम्मेदारी
निर्णय लेने की
मगर पलायन नही करता
अपितु
देता हूँ सलाह
सहयोग
जहाँ और जैसे
अपेक्षित हो
बच्चो को।
उम्र
कोई भी हो
अच्छी होती है
कुछ लेती है
कुछ देती है।
कभी बचपन छीनकर
युवा बना देती है
जोश खरोश
उमंगे दे जाती है।
उम्र
युवावस्था में भी
कहाँ ठहर पाती है?
जल्द ही
जवानी का
अहसास करा जाती है।
छीनकर जोश
दे जाती है
सपने
भविष्य के लिये
सुखद सलोने।
उम्र
ठहरती नही
जवानी के सपने
पूरा करने की चाह
संघर्षशील जीवन
यही तो है
जवानी का दर्पण।
उम्र
यहाँ भी नही ठहरती
गतिशील
मगर
अनुभवों की गठरी
सिर पर लादे
स्वयं से समाज को
आत्मसात करती
पारिवारिक दायित्वों का
निर्वाह करती
बढती रहती है
चलती रहती है
धीरे-धीरे
पग पग।
उम्र
नाम है
निरन्तरता का
जहाँ ठहरी
खेल खत्म
और मुसाफिर
मात्र रह जाता है
मिट्टी।
मगर नही
इससे पहले भी
उम्र
चलती है
स्वयं में से
स्व का त्याग कर
भगवत् कार्यों के लिये
केवल और केवल
सत्कर्म की अभिलाषा
मानवता
परोपकार
की चाह
तजुर्बे से
परिवार मे
रिश्ते खोजती
दूर रहकर भी
नजदीकियां तलाशती
नये रिश्तों का
निर्माण करती
सबके सुख की
कामना करती।
उम्र
न कभी रूकती
और
न ही कभी थकती।
अपितु
बचपन
युवा
जवानी
बुढापा
हमारे
अनुभवों के पडाव हैं
समय समय पर
दायित्वों का निर्वाह है
और है
ईश्वर के प्रति
कृतज्ञता ज्ञापन का
सुनहरा अवसर।
उम्र
अनुभूति है
हमारे मन की
सामाजिक मर्यादाओं की
शारीरिक क्षमताओं की।
उम्र
हर पल अवसर है
उत्सव का
नकारात्मक को त्याग
सकारात्मक अपनाने का।
 
*मुजफ्फरनगर
 

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