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पौधे तुलसी के (दो गीत)
November 17, 2019 • डॉ. मनोहर अभय • गीत/गजल

*डॉ. मनोहर अभय*

आँधी पानी झेल रहे
पौधे तुलसी के

सूरज तुम देखा करते
नाच नए  उजियारे का
है प्रकाश की फसलों पर
पहरा अँधियारे का
जाने कब मुस्काएँगे
नील- कुसुम अलसी के|

खाली आँखों से झरता है
झर- झर खारी  नीर  
उधर डिनर में परस रहे
शाही मटर पनीर
कुशन बदलना चाह रहे
लंगड़ी कुर्सी के |

कथा- भागवद सुनते आए
भूखी सदियों से
लिखवाएँगे जनम कुंडली
प्यासी नदियों  से
बैठे ठाले सुने जा रहे
भजन भगत नरसी के |

विहग लौट आए हैं
लिए गगन के सपने
किसे सुहाते पीछे छूटे
धरती के अपने
बटन टाँकने बैठा दर्जी
जर्जर  जर्सी के |

उखड़ी- उखड़ी घूम रही
रंगी- पुती तितली
लिए गंध की भारी गठरी
खड़ी केतकी इकली  
कुचल गए गजराज
सरसिज सरसी के|

बिसरे हुए दिन याद आते

बिसरे हुए दिन याद आते
चौड़े चबूतरे पर
जेबरी बट रहे कक्का
जाति के विजाति के
चिलम पी रहे हुक्का
राजी खुशी पूछते
बतियाते|

सामने मंदिर बड़ा
सेंजने का पेड़
हरे- पीले पत्ते चबातीं
बकरियाँ औ 'भेड़
खेलते बच्चे
पतंगें उड़ाते |

लम्बी दुआरी पार
बरोसी रौस पर धरी
सुलगते अँगारों पर
हड़िया दूध की चढ़ी
बिलोएगी दही अम्मा
माखन निथारते |

घुप अँधेरे में
चलने लगीं चाकियाँ
पीसतीं बेझर पुरानी
द्योरानी जिठानी काकियाँ
खनकती चूड़ी
कँगन खनखनाते |

रसोई में धुआँ
रोटी सेकतीं दुलहिनें
झाड़ू बुहारू में लगीं
छोटी- बड़ी बहिनें
थक गए हाथ
अँगना बुहारते |

समय व्यालू का हुआ
चँदिया खाएगी बछिया
थालियों में परोसी
रोटी साग भुजिया
जींवनें आ रहे दद्दू
खाँसते मठारते |

*डॉ. मनोहर अभय
प्रधान संपादक अग्रिमान  
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