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पतित पावनी गंगा के पांव धरा पर
May 31, 2020 • नीरज मिश्रा • लेख
*नीरज मिश्रा
अखंड भारत वर्ष प्राचीन सनातन धर्म की 4 शाखाएं (हिंदू ,जैन ,बौद्ध ,सिख )धर्म अनेक, वेशभूषा अनेक, अनेक भाषाएं और इस अनेकता में एकता लिए, हमारा भारतवर्ष, जिसमें अनेक विभूतियों ने जन्म लिया। भारत भूमि ,आर्यों की भूमि के नाम से जानी जाती है।  इस धरा पर उत्कृष्ट विभूतियों के जन्म लिया। जिसके कारण यह धरा सदैव उत्कृष्टता की ओर अग्रसर हुई है। यह लेख गंगा दशमी एकादशी तिथि के उपलक्ष में ऐसी ही विभूति के दर्शन के लिए तत्पर है।
रामायण के बालकांड में श्रद्धेय गुरु वशिष्ट जी ने राम जी के कुलो का वर्णन किया है । जो इस प्रकार है। "ब्रह्मा जी से मरीचि हुए, मरीचि के पुत्र कश्यप, कश्यप के पुत्र विवस्वान हुए ,विवस्वान के पुत्र वैवस्वता मनु हुए, मनु के समय जलप्रलय हुआ था ।मनु के 10 पुत्रों में से एक का नाम इक्ष्वाकु था। इक्ष्वाकु ने अयोध्या को अपनी राजधानी बनाई और इक्ष्वाकु कुल की स्थापना की ।इक्ष्वाकु के पुत्र कुक्षि हुए ,कुक्षि के पुत्र का नाम विकुक्षि था । विकुक्षि के पुत्र वाण हुए, उनके पुत्र अनरण्य हुए ,अनरण्य से पृथु हुए, पृथु से त्रिशंकु का जन्म हुआ । त्रिशंकु के पुत्र धुंधुमार हुए, धुंधुमार के पुत्र का नाम युवनाश्व था । युवनाश्व के पुत्र मांधाता हुए। मांधाता से सुसन्धि का जन्म हुआ। सुसन्धि के दो पुत्र हुए ।ध्रुव संधि एवं प्रसेनजीत। ध्रुवसंधि के पुत्र भरत। भरत के पुत्र आसित ।असित के पुत्र सगर और सगर के पुत्र का नाम असमंज था ।असमंज के पुत्र का नाम अंशुमान था ।अंशुमान के पुत्र दिलीप और दिलीप के पुत्र का नाम भागीरथ भागीरथ था। इन्होंने ही अपने पूर्वजों के तर्पण के लिए ही मां गंगा को ,इस पावन धरा पर उतारा। इसी वंश में आगे चलकर भगवान विष्णु , मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामचंद्र के रूप में अवतरित हुए।
गंगा दशहरा, मां गंगा को समर्पित एक पर्व है। जिसे गंगा दशहरा को गंगावतरण ही कहा जाता है। जिसका अर्थ है "गंगा का अवतार"। हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार भागीरथी ने अपने पूर्वजों के मोक्ष के लिए मां गंगा को धरती पर लाना चाहते थे ।क्योंकि एक श्राप के कारण केवल मां गंगा ही उनके पूर्वजों का उद्धार कर सकती थी ।जिससे भागीरथी ने उनकी कठोर तपस्या की। तपस्या से प्रसन्न होकर मां गंगा ने उनको दर्शन दिए ।भागीरथी ने उनको धरती पर आने का आग्रह किया। मां ने उनकी स्वीकार कर ली ।हालांकि मां गंगा का वेग इतना प्रचंड था ।कि वे सीधे स्वर्ग से धरती पर आती तो पाताल लोक में चली जाती। इस प्रचंड वेग को अपने अधीन करने की शक्ति किसी में नहीं थी। शिवाय त्रिलोकीनाथ के। सभी देवताओं ने और ऋषि यों ने मिलकर उनसे प्रार्थना की। कि वह मां गंगा को धारण करके भागीरथी के प्रयासों को पूर्णता प्रदान करें ।जटाधारी शिव ने मां गंगा को अपने जटाओं के में स्थान दिया। या यूं कहें कि उनके वेग  को अपने अधीन कर लिया ।तब मां गंगा कैलाश से होती हुई पृथ्वी पर अवतरित हुई ।इसके बाद भागीरथ ने अपने पूर्वजों की अस्थियों को गंगा में प्रवाहित कर, अपने पूर्वजों को श्राप से मुक्ति दिलाई।
इस जेष्ठ मास की दशमी तिथि को ही उनका पृथ्वी पर अवतरण हुआ था । जिससे इस तिथि को गंगा दशमी या गंगा दशहरा के रूप में मनाया जाता है। इस तिथि से ही मां गंगा की पूजा अर्चना की जाती है ।कहा जाता है जो व्यक्ति इस दिन गंगा में स्नान करके पूजा-अर्चना करता है ।उसके सभी पाप धुल जाते हैं। गंगा दशहरा के दिन दान का विशेष महत्व होता है। इस दिन सत्तू, मटका ,हाथ का पंखा दान करने से दुगना फल मिलता है। इस दिन दान की संख्या 10 होनी चाहिए जैसे 10 दीपक ,10 प्रकार के पुष्प, 10 प्रकार के नवैध इत्यादि।
अब बात आती है। एकादशी की, जेष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को निर्जला एकादशी तिथि कहते हैं ।इस‌ तिथि को उत्तम तिथियों की श्रेणी में रखा जाता है। यह वर्ष की सबसे बड़ी एकादशी तिथि मानी जाती है ।कहा जाता है ,जो व्यक्ति पूरे वर्ष की एकादशी का व्रत ना रख कर पाए तो केवल जेष्ठ मास की एकादशी का व्रत करने से उसे पूरे वर्ष की एकादशी तिथि का व्रत का पूर्ण फल मिल जाता है। इस व्रत में साधक बिना जल ग्रहण किए व्रत रखता है। एक तो जेष्ठ मास की प्रचंड गर्मी उस पर बिना जल के व्रत करना कठिन हो जाता है। यह व्रत सभी व्रतों का राजा कहलाता है।
*नीरज मिश्रा, उरई, जालौन ( उत्तर प्रदेश)
 

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