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पर्यावरण-हितैषी है शाकाहारी जीवनशैली
June 4, 2020 • डॉ. दिलीप धींग • लेख

*डॉ. दिलीप धींग 
भारतीय संस्कृति और अध्यात्म-जगत में अहिंसा का विस्तार समस्त प्राणिजगत तक हुआ है। यहाँ पशु-पक्षियों की रक्षा और सुरक्षा की बात भी कही गई है। वस्तुतः सम्पूर्ण प्राणिजगत हमारे समग्र अस्तित्व का अभिन्न हिस्सा है। किसी भी प्राणी को मारना और सताना पूरे अस्तित्व के साथ खिलवाड़ करना है। जीवन और जगत एवं प्रकृति और संस्कृति की रक्षार्थ सहअस्तित्व एक अनिवार्य शर्त है। शाकाहार और जीवरक्षा की अवधारणा सहअस्तित्व और समता के लिए भी आवश्यक है।
भारतीय मनीषियों ने पशुवध, शिकार और मांसाहार को अनुचित बताया है। भारत में पशुपालन के साथ मूलतः खेतीबाड़ी, पशु-संरक्षण और पर्यावरण-संरक्षण का विचार जुड़ा है। मसलन, गाय प्रजाति के चौपाये, घास और पेड़ों में पारस्परिक निर्भरता होती है। पेड़ों की रक्षा के बिना हिरण, गाय, बकरी, भैंस आदि की रक्षा नहीं हो सकती और हिरण, गाय, बकरी, भैंस आदि की रक्षा के बिना पेड़ों और चरागाहों की रक्षा नहीं हो सकती। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि पेड़ जहाँ भी बचे या बचाए जा सके हैं, वहाँ पेड़ पर आश्रय लेने वाले पक्षी, पेड़ के नीचे आश्रय लेने वाले पशु और पेड़ के फल-पत्तियों आदि के सहारे जीने वाले जीव-जन्तु नहीं बचे हैं। 
न्यू मैक्सिको विश्वविद्यालय के एक शोध के अनुसार इंसान जिस तेजी से स्तनधारी जीवों का शिकार करता आ रहा है, इससे अगले 200 वर्षों में स्तनधारियों में सिर्फ गाय बचेगी। सिर्फ एक या कुछ स्तनधारियों का बचना पर्यावरण के लिए नितान्त अपर्याप्त है। अप्रेल-2018 के एक शोध-निष्कर्ष के अनुसार अफ्रीका जैसे बड़े महाद्वीप में भी मनुष्यों की वजह से बड़े आकार के स्तनधारी तेजी से कम हुए हैं। सभ्यता के विकास में मानव जहाँ-जहाँ भी गया, बड़े स्तनधारी जीवों की संख्या में कमी आती गई। दक्षिण अफ्रीका के मियाम्बो वनप्रदेश में 80 प्रतिशत स्तनधारी प्राणी अपने अस्तित्व संकट से जूझ रहे हैं। 
आदमी की मांसाहारी आदतों और शिकारी वृत्तियों  के कारण संसार की लगभग 300 वन्य स्तनधारी प्रजातियाँ लुप्त होने के कगार पर है। ‘रोयल सोसायटी ओपन साइंस’ नामक पत्रिका में 2016 में प्रकाशित एक शोध में पन्द्रह पर्यावरण वैज्ञानिकों ने इस स्थिति को उष्णरक्तीय स्थलीय पशुओं के लिए वैश्विक संकट बताया है। उधर, मत्स्याखेट के कारण जलीय पर्यावरण और समुद्री जैव-विविधता को भारी नुकसान पहुँच रहा है। 
आदमी की क्रूर हरकतों ने अनेक पशु-पक्षियों और जीव-जन्तुओं को खत्म कर दिया है। इसका यह भी दुष्परिणाम आया है कि अनेक वनस्पतियाँ और उनकी प्रजातियाँ या तो विलुप्त हो गई या विलुप्ति के कगार पर है। यह एक तथ्य है कि अनेक वनस्पतियों के बीज किसी पशु या पक्षी के पेट में जाने के बाद पुनः मल या बीट से निकलने पर ही फलित होते हैं तो अनेक वनस्पतियाँ किसी पशु या पक्षी के मल या बीट से ऊर्वर हुई मिट्टी में ही सही रूप से पनप सकती हैं। किसी जीव या जीव की एक भी प्रजाति के विलुप्त होने से प्राणी और वनस्पति जगत की अनेक प्रजातियाँ संकट में पड़ जाती हैं। आदमी ने अपने स्वाद, स्वार्थ, मनोरंजन, शिकार और पशु-पक्षियों की हिंसा से जुड़े कर्मकाण्डों के नाम पर प्रकृति और पर्यावरण को अपूरणीय क्षति पहुँचाई है। उसी क्षति का एक वीभत्स रूप वर्तमान में कोरोना महामारी के रूप में प्रकट हुआ है, जिसके कारण पूरी दुनिया ठहर गई और लाखों मनुष्य असमय में ही काल-कवलित हो गये। 
वर्ष 2007 में संयुक्त राष्ट्र के इंटरगवर्नमेंटल पेनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) को नोबेल शान्ति पुरस्कार के लिए चुना गया था। आईपीसीसी के तत्कालीन अध्यक्ष राजेन्द्र पचौरी पक्के शाकाहारी थे। उनका कहना था कि मांसाहार से तौबा करना जरूरी है। क्योंकि मांस उत्पादन से जलवायु को खासा नुकसान पहुँचता है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51 (जी) में कहा गया है कि प्रत्येक नागरिक वन और पर्यावरण की रक्षा करे तथा प्राणिमात्र के प्रति दयाभाव रखे। नागरिकों के इस संवैधानिक कर्तव्य में पर्यावरण और शाकाहार का सहसम्बन्ध बताया गया है। 
‘फ्रेंड्स ऑफ अर्थ’ संस्था के मुताबिक मांस व मांस-उत्पाद पैदा करने के लिए हर साल करीब 6 लाख हेक्टेयर जंगल काट दिये जाते हैं। ‘वर्ल्ड वॉच’ (जुलाई-अगस्त 2004) के अनुसार पर्यावरण की क्षति का एक बड़ा कारण मांसाहार है। अमेरिका की राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी के एक शोध के अनुसार यदि पूरे संसार में शाकाहार को बढ़ावा मिले तो धरती को अधिक स्वस्थ, अधिक शीतल और अधिक समृद्ध बनाया जा सकता है। 
दुनियाभर के वैज्ञानिक और पर्यावरणविद् यह स्वीकार करते हैं कि विश्व के वर्तमान और भविष्य को सुरक्षित करने के लिए मानव को जल्दी से जल्दी शाकाहारी जीवनशैली की ओर लौटना होगा। इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए बोन (जर्मनी) में नवम्बर-2017 में आयोजित 23वें जलवायु परिवर्तन सम्मेलन (क्लाइमेट चेंज समिट) में पहली बार 60 प्रतिशत खाना शाकाहारी रखा गया। ज्ञातव्य है कि पूर्व में पेरिस में हुए सम्मेलन में सिर्फ 30 प्रतिशत भोजन ही शाकाहारी था। शाकाहार को अधिक महत्व देने का कारण यही रहा कि शाकाहार से जलवायु-परिवर्तन और पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं होता है। इसके विपरीत मांसाहार से पर्यावरण को भारी नुकसान होता है। 
इस विश्व सम्मेलन में 197 देशों के 25 हजार लोगों ने भाग लिया। सम्मेलन में प्लास्टिक की बोतलों का उपयोग नहीं किया गया तथा चाय-कॉफी भी मिट्टी के कुल्हड़ में पिलाई गई। सम्मेलन में कागज के उपयोग की बजाय एप बनाया गया, जिससे सूचनाओं का आदान-प्रदान हो सके। कागज-निषेध के चलते सम्मेलन की विवरणिका भी नहीं छपवाई गई। सम्मेलन की अध्यक्षता छोटे-छोटे टापुओं के देश फिजी ने की। प्रदूषणजनित जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्र के बढ़ते जलस्तर से फिजी अस्तित्व-संकट से जूझ रहा है। फिजी के प्रधानमंत्री ने दुनिया से ऐसा जीवन जीने की गुजारिश की, जिससे पर्यावरण को नुकसान नहीं हो। निश्चित ही ऐसे जीवन के लिए शाकाहार, संयम और सादगी जैसे गुण आवश्यक है।
आज दुनिया अनेक समस्याओं से जूझ रही है। इन समस्याओं में पर्यावरण प्रदूषण और विभिन्न महामारियाँ धरती और धरतीवासियों के लिए खतरा बनी हुई है। जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग (वैश्विक तापवृद्धि) जैसी समस्याएँ प्रदूषण की ही देन है। मांसाहार इन समस्याओं का एक प्रमुख कारण है। मांसाहार लिए संसार में प्रतिवर्ष करोड़ों पशु-पक्षी क्रूरतापूर्वक मार दिये जाते हैं। शाकाहार के उत्पादन की तुलना में मांस-उत्पादन में कई गुना अधिक जीवाश्म-ईंधन (फॉसिल फ्यूल) लगता है। मांसाहार के उत्पादन में जितनी ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन होता है, वह कुल उत्सर्जन का 20 प्रतिशत है। यह दुनियाभर के वाहन, हवाई जहाज, ट्रेन और परिवहन के दूसरे साधनों से होने वाले उत्सर्जन से भी ज्यादा है। 
जंगलों का खात्मा, मरुस्थलीकरण, भूक्षरण, पेयजल संकट, वायु और जल प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, जैव-विविधता में हानि, सामाजिक अन्याय, सामुदायिक अस्थिरता, कोविड-19 जैसी अनेक समस्याओं के लिए मांसाहार जिम्मेदार है। मांसाहार से वर्षा-वन समाप्त हुए हैं। हिम-नदियाँ (ग्लेशियर) सिकुड़ी हैं। प्रदूषण और तापमान बढ़ा है। प्रदूषण और मानवीय कारणों से पिछली आधी सदी में लगभग छह लाख करोड़ पशु-पक्षी और जीव-जन्तु अकाल मौत मरे हैं। बढ़ते तापमान से देश-दुनिया के वनप्रदेशों और अन्य क्षेत्रों में रहने वाली जीवों की हजारों प्रजातियाँ नष्ट हो गईं और हजारों प्रजातियाँ संकट में हैं। मांसाहार के कारण धरती पर ताप बढ़ने के साथ ही तरह-तरह के संताप भी बढ़े हैं। अब यह दिन के उजाले की तरह सुस्पष्ट है कि धरती को पाप, ताप, सन्ताप और प्रदूषण के अभिशाप से मुक्त करने के लिए सर्वाधिक प्रभावी उपाय शाकाहारी और संयमित जीवनशैली है।
(लेखक अंतरराष्ट्रीय प्राकृत अध्ययन व शोध केन्द्र चैन्नई के निदेशक है)
 

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