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परिचर्चा: लॉकडाउन: कैसे करें सामना
May 9, 2020 • किशोर श्रीवास्तव • समाचार

आजकल समूचे विश्व को कोरोना के कहर ने हिला कर रखा हुआ है। इससे हम भी अछूते नहीं रहे। जहां चाइना, इटली, अमेरिका जैसे देशों को कुछ नहीं सूझ रहा है वहीं घनी आबादी वाले भारत जैसे विकासशील या अन्य छोटे-मोटे देशों का क्या। कभी हम छुट्टियों को तरसते थे और आज छुट्टियां हैं कि हमें काट रही हैं या काटे नहीं कट रही हैं।बेशक अंधेरे में उजाला और दुख में सुख ढूंढ़ लेने की हम भारतीयों की प्रवृत्ति अनेक बाधाओं को पार करने में हमारी मदद करती रही है और आज भी कर रही है।
ऐसे में हमने कोरोना के कहर और लॉकडाउन के चलते परिवार, देश और समाज पर पड़ने वाले असर और घर बैठकर सुगमता से तनाव रहित समय बिताने के लोगों के गुन जानने के लिए कुछ सुधि साहित्यकारों, शिक्षकों और कलाकारों आदि से पिछले दिनों बात की। कुछ लोगों के अनुभव, प्रेरक विचार और सलाह यहां हम अपने पाठकों के लिए भी प्रस्तुत कर रहे हैं। उम्मीद है आप सब भी उनका लाभ उठाएंगे।

- किशोर श्रीवास्तव, दिल्ली (परिचर्चा संयोजक)

बच्चों और खुद को सृजनात्मक कार्यों से जोड़ें
लॉकडाउन ने सभी के जीवन को एक ही स्तर पर ला दिया है । न कोई उच्च स्तर और न कोई निम्न स्तर पर खड़ा है । स्वावलंबन की ओर चल पड़ा है जीवन। चाहे जिस स्तर के हो घर की सफाई से लेकर किचन के सारे काम गृहणी स्वयं कर रही हैं।सही अर्थों में परिवार का एक दूसरे के साथ समय गुजारने का अवसर मिल रहा है । कहाँ भागती दौड़ती जिंदगी में बच्चों व घर के लिए समय नहीं था और अब वही परिवार साथ-साथ समय गुजार रहा है। ऐसे में हमारा कर्तव्य है कि इस समय हम उन बातों से बच्चों का परिचय कराएं, जिन्हें स्कूल और कोचिंग के बीच कभी समय नहीं मिला। यह खाली समय उनका नैतिक मूल्यों से परिचय कराने का भी है। हम बच्चों की छिपी प्रतिभा को बाहर लाने का प्रयास करें। कला, लेखन और सृजन की क्षमता पहचानने का अवसर मिलने का सभी लाभ उठाइये। आवश्यकताएँ सीमित हो गई क्योंकि न मॉल की सैर और न फास्ट फूड का सेवन । न बेवजह घूमने सैर करने के नाम पर अनावश्यक खर्च। निजी वाहनों के संचालन पर अंकुश ने प्रदूषण को भी नियंत्रित किया है । देश और जनमानस के लिए स्वनियंत्रित करने की आदत का विकास और महत्व को समझने का मौका मिल रहा है अतः दूसरों के जीवन सुरक्षित रखने में अपने योगदान को सुनिश्चित करिये । 
- रेखा श्रीवास्तव (काउंसलर/ब्लॉगर), कानपुर

सावधानी ज़रूरी
वर्तमान में वैश्विक महामारी कोरोना के कारण हम सभी घरों में कैद हो गए हैं कारण है लॉकडाउन।कोरोना के कारण लॉकडाउन ही एक उचित विकल्प दिखाई पड़ता है अन्यथा की स्थिति में आपकी अथवा आपके प्रियजनो की स्थिति गंभीर हो सकती है परंतु इस कारण जीवन में अस्थिरता सी आ गयी है क्योंकि प्रतिदिन की दिनचर्या भी अस्त-व्यस्त हो चुकी है।समाज का गरीब तथा मध्यमवर्गीय समाज परेशान दिखाई दे रहा है, आखिर सवाल है पेट का साथ ही परिवार का। एक छोटा दुकानदार जो प्रतिदिन कमाकर किसी तरह अपने परिवार का लालन-पोषण करता हैं; इस आपदा ने उसे एक एेसी धुरी पर लाकर खड़ा कर दिया है जहां से उसका बाहर निकलना मुश्किल प्रतीत होता है क्योंकि न तो वह किसी सरकारी सुविधा का हकदार होता है न ही किसी के आगे अपने हालातों पर रो सकता है। अतः उसके जीवन यापन के लिए विचार करना भी आवश्यक हो गया है। लॉकडाउन में गरीबो को सरकार द्वारा मुफ़्त में राशन, गैस सिलेंडर तथा कुछ को नकद सहायता प्रदान की जा रही है जिससे फ़िलहाल उनके जीवन में कठिनाईयां पूर्व की अपेक्षा कम रहेगी परंतु छोटे दुकानदारो का भी ध्यान रखना आवश्यक होगा ताकि वे भी अपना जीवनयापन सुचारु रुप से कर सकें। इसके अतिरिक्त सभी को घरो में ही रहना होगा क्योंकि घरों से बाहर निकलते ही हम सोशल डिस्टेन्सिग के महत्व को भूल जाते हैं जिस कारण देश में कोरोना मरीजों की संख्या में निरंतर बढ़ोतरी हो रही है। शरीर स्वस्थ रहे इसके लिए प्रतिदिन योगासन भी करना आवश्यक है। यदि बाहर निकलना भी पड़े तो मास्क का प्रयोग अवश्य करें तथा अन्त में एक ही बात कहूंगा, सावधानी ही बचाव हैं। अतः सावधानी रखना बहुत ज़रूरी है। बाकी खाली समय में करने को भहुत कुछ है, जिससे समय भी पास होगा और ज्ञान का भंडार भी बढ़ेगा।
- विभोर अग्रवाल (शिक्षक),बिजनौर (उप्र) 
 
चुनौतियों के बीच अवसर
कारोना जिसने संपूर्ण विश्व को अपनी चपेट में ले रखा है। अभी कुछ दिनों तक कभी सोचा भी न था कि कभी ऐसा भी हो सकता है। लॉकडाउन जो एकदम अचानक ही नहीं हुआ अपितु 21 और फिर 28 दिनों के लिए घोषित किया गया और शायद इसे और बढ़ाए जाने की पूरी संभावना है। और भविष्य में भी अगर स्थिति थोड़ी सामान्य होती भी है तो बहुत सावधानी से कदम फूंक-फूंक के चलने पड़ेंगें। अब जीवन यापन के लिए भी कुछ नए सिरे से सोचने पर हम सभी मजबूर हो गए हैं। जैसे सरकारी संगठन, विद्यालय, निजी कंपनियां तो वर्क फ्रॉम होम से कर रही हैं, जिसके लिए लैपटाप, इंटरनैट कनैक्शन की निरंतर आवश्यकता पड़ रही है। स्वच्छता, मास्क और सैनिटाईजर की मांग अत्याधिक बढ़ गई है। हमारे सामने बहुत चुनौतियां हैं। पर मेरा मानना है कि हर आपदा में हमें अवसर ढूंढ़ने चाहिए। जैसे वर्तमान परिप्रेक्ष्य में बहुत से धंधे ठप्प पड़ गए हैं। पर बाजार तो हमेशा से ही मांग और आपूर्ति के अनुरुप ही चला है। तो समय तो लगेगा पर जिन वस्तुओं की इस वातावरण में ज्यादा जरुरत है या भविष्य में संभावना है, जीवन यापन के रास्ते भी इसी से संबंधित बनेंगे। आज इसी वजह से आनलाईन, वर्क फ्रॉम होम जैसी नवीन संकल्पनाएं सामने आई हैं। नि:संदेह पहले-पहले थोड़ी मुश्किल हुई किंतु जीवन यापन के नए अवसर भी स्वत: इससे ही उभर कर सामने आएंगे। हमको बस सकारात्मकता को पकड़ कर रहना है और धैर्य के साथ इस कठिन समय में चुनौतियों में से जीवन जीने के लिए अवसर ढूंढ़ निकालना है। इस समय इस बात की भी अत्यंत आवश्यकता है कि यदि हमारी आर्थिक स्थिति कुछ बेहतर है तो हम ऐसे लोगों को आर्थिक मदद करने के लिए स्वत: आगे आएं जिनके पास बुनियादी सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं हो पा रही हैं।
- मीनाक्षी भसीन,(अनुवादक,लेखिका)दिल्ली

अपने साथ रहने की ठान लें
अचानक ही हम सबके शब्दकोश में एक शब्द सबसे ऊपर आ गया है, लॉक डाउन। इस शब्द से हमारा अब तक परिचय नहीं था इसलिए इससे निपटने की तैयारी भी नहीं थी। यह अचानक ही घने कोहरे से आया है और हम सब के जीवन पर छा गया है। बहुत से लोग यह समझ नहीं पा रहे कि इस लॉकडाउन को पार कैसे करना है? इस समय जीवन को सकारात्मकता से जीने के लिए सबसे ज़रूरी है अपनी दिनचर्या को उन सारी चीजों से दूर रखना जो हमें उदासी तथा अवसाद की ओर ले जाती हैं।फिलहाल 'सोशल डिस्टेंसिंग' लागू है। अपना संबल हम कहीं और नहीं ढूंढ़ सकते तो क्यों न अपने भीतर एक ऊर्जा जगाई जाए।
ऐसा समय हमें दोबारा नहीं मिलने वाला, इस बात को ध्यान में रखकर बहुत कुछ सार्थक किया जा सकता है। वह सब कुछ, जिसे करने के लिए हम समय ढूंढ़ते थे और हमें समय नहीं मिलता था। कोई पुराना शौक, कोई ज़रूरी काम, सुकून के चंद लम्हे या अपनों के साथ खो गई नज़दीकियां। आइए, ऐसी ही कुछ तरकीबों से 'लॉक डाउन' के इन दिनों को न सिर्फ आसान बल्कि ख़ुशगवार बना दें। ज़्यादा मुश्किल नहीं है यह। बस एक बार ठान लीजिए "अपने साथ रहना है और ख़ुश रहना है।"
-प्रतिमा सिन्हा (रंगकर्मी), वाराणसी

ऑनलाइन कार्य को प्रोत्साहन
लॉकडाउन ने हमें घर पर सीमित कर दिया है। इसने हमें सोचने-विचारने का बहुत समय दे दिया है। अनेक कार्य ऐसे हैं जिन्हें घर बैठे किया जा सकता है। सरकार ने बच्चों को घर पर कार्य देने के लिए कई प्रोग्राम बनाए हैं। ऐसे कार्यक्रम शिक्षक भी स्वयं पढ़ाते समय बना सकते हैं। ताकि वे घर बैठे अपना शिक्षण कार्य कर सकें। ऐसा ही कई अन्य क्षेत्रों में भी हो सकता है। बीमा कंपनी में बहुत से काम कार्यालय में होते हैं। जैसे, जन्मतिथि प्रमाणपत्र की स्कैन, आधार कार्ड जैसे कई कागजात नेट पर लोड करना आदि। ये सब कार्यालय में होते हैं। इन्हें घर पर भी किया जा सकता है। जांचने और उसकी प्रमाणिकता का कार्य कार्यालय कर सकता है। ऐसे ही तहसील कार्यालय के अधिकांश कार्य को आनलाइन किया जा सकता है। जाति प्रमाणपत्र, निवासी प्रमाणपत्र जैसे कार्य को आनलाइन किया जा सकता है। इससे कागजी कार्यवाही कम होगी। तहसील कार्यालय आदि में भीड़ भी कम होगी। इस प्रकार से ऐसे कई कार्य हैं जिन्हें आनलाइन करके लॉक डाउन को सफल बनाया जा सकता है.
- ओमप्रकाश क्षत्रिय 'प्रकाश'(शिक्षक), नीमच, मप्र

अपने शौक को नया आयाम दें
हम चाहे तो थोड़े से प्रयास से लॉकडाउन को उपयोगी बना सकते हैं। अभी समय मिला है तो, परिवार के साथ क्वालिटी टाइम बितायें। हो सके तो सुबह जल्दी उठें और उगते हुये सूरज को देखें और अपने अंदर एक सकारात्मक ऊर्जा का संचार महसूस करें। पुराने अल्बम निकालें परिवार के सभी सदस्यों के साथ देखें, ऐसा महसूस होगा जैसे उस जिंदगी को हम दोबारा जी रहे हों। खाली समय में सोसल मीडिया की जी भर कर सैर करने के साथ अवांछित खरपतवार को भी हटाएँ। उपलब्ध कलमों और बीजों को गमलों में लगायें और उनकी देखभाल करें, जब उनमें फूल और फल पैदा होंगे तो आपकी खुशी देखने लायक होगी। योगा और मेडिटेशन न करने के पीछे हमारा पहला तर्क समय की कमी ही होता है। तो अब उपयुक्त समय है, तन-मन रिफ्रेश करने का। इस प्रकार से हम में से अधिकांश लोगों का आपका जो भी शौक हो नृत्य, गायन, वादन, पेंटिंग, कुकिंग उसे वक्त है नया आयाम देने का।
- पूजा अग्निहोत्री (पटकथा लेखक) छतरपुर, मप्र

भागते नहीं, ठहरे वक्त की कद्र
भारत में लाॅकडाउन काफी हद तक सफल है, सफलता का यही रास्ता भी है। अन्यथा हम भी कब्रिस्तान की कमी का रोना रो रहे होते। कल भागते वक्त की तेजी देखी। आज अपनों के साथ ठहरे वक्त की मिठास महसूस की। अपने और अपनों से मिलने का समय। नहीं! अभी लाॅक डाउन खत्म करना अपने पाँव पर कुल्हाड़ी मारना है। खुलते ही टूट पड़ेंगे भारतीय।  पहले परिस्थितियाँ कंट्रोल में आने की संभावना थी, नयी परिस्थितियों में बढ़ते कोरोना मरीज को देखते हुए किसी भी कीमत पर खुली छूट नहीं दी जा सकती, अन्यथा हम सबको बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी। भुक्तभोगी देशों का उदाहरण सामने है। भारतीय हर बात हल्के में लेने के आदी हैं, मजाक में भी परंतु अब तो जग रहे हैं, गंभीरता को समझ रहे हैं। यह सच है कि बहुत तरह की  दिक्कतें आएंगी और आगे बढ़ेंगी परंतु मौत के आगे सब कम है। यह महामारी जानलेवा, उससे भी ज्यादा तकलीफ़देह कि यह संक्रामक है।मुसीबत में करें दूर से सबकी भरपूर मदद, अपनी क्षमता से ज्यादा । घर में खाली समय का घरेलू कार्यों में उपयोग करें। खुद हिम्मत रख, हौसला बढ़ाएँ सबका। हम सबको मिलकर इस संक्रामक बीमारी से है लड़ना। 
-अनिता रश्मि (साहित्यकार) रांची, झारखंड

सुधार का मौका
दुनिया में चीन के बाद भारत दूसरा घनी आबादी वाला देश है साथ ही क्षेत्रफल के दृष्टिकोण से जनसंख्या घनत्व भी ज़्यादा है। कोरोना वायरस का संक्रमण फैलने की दर भारत में यूरोप के देशों की अपेक्षा बहुत कम है। परिस्थितियों को देखते हुए भारत में लॉक डाउन पूरी तरह सफल रहा है । कुछ नासमझ लोगों की गलती  या  कुछ लोगों की मानवीय भूल के कारण आँकड़ा ज़रूर बढ़ा है पर भारत में लॉक डाउन पूरी तरह सफल ही रहा है । इसके समूल नाश तक सोशल डिस्टेन्सिंग, सख्त कानूनी कार्यवाही आदि चलती रहनी चाहिए। मीटिंग, सभाएँ, धार्मिक सामाजिक कार्यक्रमों पर पूरी तरह रोक लगाने की आवश्यकता है। जब तक इसके मरीज़ मिलते रहे तब तक लॉक डाउन को जारी रखने में कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए । वैसे लॉक डाउन से प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष हानि ही नही हुई बहुत से लाभ भी हुए हैं जैसे ग्लोबल वार्मिग में 1.5 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। गंगा-यमुना जैसी नदियों का पानी प्रदूषण मुक्त हुआ है। आसमान साफ़ हो गया है। ध्वनि प्रदूषण कम हुआ है। ये लाभ वो लाभ हैं जिन्हें हम कैसे भी कम नहीं कर पा रहे थे। लॉकडाउन ने प्रकृति के साथ साथ हम में भी सुधार का एक मौका दिया है। एक बात यह भी महत्वपूर्ण हुई है कि हमारे जो बहुत से घरेलू, पारिवारिक काम वर्षों से रुके पड़े थे और हम अंधाधुंध प्रकृति के दोहन में लगे हुए थे; आज उन्हें पूरा करने या राहत देने का हमें अनूठा अवसर मिला है।
- डॉ. भूपेन्द्र कुमार (साहित्यकार) बिजनौर, उप्र

सेवा में सुकून ढूंढ़ें
यह समय खुशियों का हो सकता है पर वास्तव में बहुत कम घरो में ही ऐसा है। हर कोई लॉक डाऊन खुलने और घर से बाहर निकलने के लिये बेकरार है। काम धन्धे बन्द है, इन्कम बन्द है, खर्चे तो है ही। सारा वातावरण अनिश्चितता से भरा हुआ है । फोन पर भी किसी से बात होती है तो भी यही विषय। लोग हँसना गाना भूल गए हैं। सोशल मीडिया ने इस डिप्रेशन टाईम में जहाँ हमारी मदद की है, अकेलेपन को दूर करने की, उतनी ही नेगेटिच रोल भी निभाया है। हर कोई अपने-अपने फोन में खोया है। हर किसी की एक अलग अपनी ही दुनिया है । बाहर निकलने से लोगों से मिलने से जी बहल जाता है। सुख दुख शेयर हो जाता है । मंदिर गुरुद्वारे जाकर मन को शांति मिलती है । पर आज मंदिर गुरुद्वारे सब बन्द पड़े हैं तो आजकल ये बिलकुल भी संभव नहीं है ।बच्चे हो या बूढ़े सब बेचैनी से घरोंं में बन्द हैं। ऐसे में सकारात्मक सोचने की बहुत ज्यादा आवश्यकता है । 
अपनो को फोन करते रहें। हाल चाल बांटते रहे। समय है तो अलसी बनने की बजाय थोड़ा व्यायाम करें। समय पर रोज नहा कर पाठ पूजा करें। दिया जलाएं। हल्का खायें। किसी की मदद कर सकें ती जरुर करें। समय भी सही से बीत जाएगा और मन को भी बेहद सुकून मिलेगा ।
- अंजू खरबंदा (रेडियो आर्टिस्ट) दिल्ली
 

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