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परेशानी के आंसू
June 25, 2020 • आशीष 'बल्लम' • कविता
*आशीष 'बल्लम'
एक आदमी बड़ा परेशान था,
हलकान था ।
बीमारी कौन सी हो गई 
इससे बेचारा अनजान था ।
डॉक्टर के सामने उसका
यह बखान था -
डॉ. साहब ,
मैं भोला-भाला कर्मचारी,
दामाद हूं ठेठ सरकारी ।
ऊपरी कमाई भी है जारी ।
ऊपर की कमाई खाता हूं तो
रात को निद्रा रूठ जाती है ।
टोंगा बंधने जैसी घबराहट से
कभी भी आंखे खुल जाती है ।
क्या आपको मेरी ये बीमारी 
समझ में आती है ?
डॉक्टर बोला -
 इस बीमारी के संबंध में
मेरा तजुर्बा बताता है ।
दादा रिश्वत खाता है और
पोता " परेशानी के आंसू "
बहाता है ।
इस लाइलाज बीमारी की 
एक ही दवा है भाई,
तुम ईमानदारी नामक दुर्लभ
चिड़िया से नाता जोड़ लो।
हराम की कमाई खाना,
रिश्वत लेना टोटल,
टोटल,टोटल छोड़ दो ।
इतना सुनते ही
हो गया पसीना-पसीना 
सरकारी कर्मचारी ।
चलने लगी उसकी 
सांस भारी-भारी ।
घबराकर बोला -
डॉक्टर साहब, 
आप तो भलतई का
इलाज बता रहे हो ।
फोकट को मेरी जान
सूखा रहे हो ।
अरे साहब, 
जिस दिन मै रिश्वत 
नहीं खाता हूं ,
उस दिन तो मेरी किस्मत
ही फूट जाती है।
बिना नींद की गोली के तो
नींद ही नहीं आती है ।
*छिन्दवाड़ा (म.प्र.)
 

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