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परम्परा संस्था की डिजिटल काव्य गोष्ठी  
April 6, 2020 • शब्द प्रवाह समाचार • समाचार

देश में लॉकडाउन की स्थिति को देखते हुए परम्परा संस्था, गुरुग्राम द्वारा एक अनूठी 'अंतरराष्ट्रीय डिजिटल गोष्ठी' का आयोजन शनिवार, दिनांक 4 अप्रैल को किया गया। इसमें अपने-अपने घरों से ही मोबाइल एवम कम्प्यूटर के माध्यम से कविताएं सुनाकर, गोष्ठी सफलतापूर्वक आयोजित की गई । गोष्ठी की अध्यक्षता आकाशवाणी, दिल्ली के पूर्व उप महानिदेशक श्री लक्ष्मी शंकर बाजपेई ने की। मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे फेडरल वे, वाशिंगटन, यू एस से वरिष्ठ समाजसेवी श्री सुभाष शर्मा तथा विशिष्ट अतिथि रहे ग़ाज़ियाबाद, उप्र से साहित्यकार, पत्रकार एवम शिक्षाविद श्री चेतन आनन्द। इस गोष्ठी में रेवाड़ी, हरियाणा से हरियाणा साहित्य अकादमी के सदस्य तथा अखिल भारतीय साहित्य परिषद, हरियाणा प्रान्त के कार्यकारी अध्यक्ष प्रो0 आर सी शर्मा का सानिध्य प्राप्त हुआ।

परम्परा के संस्थापक राजेन्द्र निगम "राज" ने बताया कि इस गोष्ठी में कोरोना वायरस से लड़ने हेतु जागरूकता फैलाने वाली रचनाओं के साथ ही अन्य विषयों पर भी रचनायें प्रस्तुत की गईं, जिसमें भारत के गुरुग्राम, दिल्ली, फ़रीदाबाद,रेवाड़ी, ग़ाज़ियाबाद आदि नगरों तथा वाशिंगटन, यू एस के वुडिनविल, रेडमण्ड, फेडरल वे, सिएटल, पोर्टलैण्ड आदि नगरों से कविगण सम्मिलित हुए।

लगभग दो घंटे तक चली इस विशेष गोष्ठी का डिजिटल संचालन राजेन्द्र निगम "राज" द्वारा किया गया। कवियों द्वारा प्रस्तुत की गई कविताओं की एक बानगी इस प्रकार है-

01. श्री लक्ष्मी शंकर बाजपेई(भारत)-

जब मिलें ज़ख़्म, तो भरने का सलीक़ा सीखे
आदमी ग़म से उबरने का, सलीक़ा सीखे......
हो के मायूस जो बैठा है, वो उस सूरज से
डूब कर फिर से उभरने का सलीक़ा सीखे......
दौड़ा फिरता है जो हर लमहा हवस में पागल
सिर्फ दो पल को ठहरने का सलीक़ा सीखे......
     
02. प्रो0 आर सी शर्मा(भारत)-

इधर बढ रही है उधर घट रही है
मज़े में मगर ज़िन्दगी कट रही है।
इधर साँझ ढलने लगी जैसे-जैसे।
उधर यूँ लगे जैसे पौ फट रही है।।

03. श्री चेतन आनन्द(भारत)-

समंदर बनके तो हरगिज़ तुम्हारा हो नहीं सकता
मुझे दरिया ही रहने दो मैं खारा हो नहीं सकता
मैं मिट्टी की तरह मिट्टी से जुड़ना जानता हूँ बस
मैं उस मग़रूर अम्बर का सितारा हो नहीं सकता।

04. डॉ कीर्ति काले(भारत)-

अन्धकार घनघोर घिरा है सहमीं सभी दिशाएँ
अनहोनी होने की बढ़ती जाती आशंकाएँ
क्यों निराश होकर बैठें हम
क्यूं करके घबराएँ
संकल्पित आशा का
आओ मिलकर दीया जलाएँ।

05. श्रीमती ममता किरण(भारत)-

जब भी हद से बढ़ा आदमी है,पाठ कुदरत पढ़ाती रही है
ज़िंदगी क़ैद है अब घरों में, बस दरीचों से वो झांकती है
मौत हो या कि फिर हो कोरोना,कितनी बेख़ौफ़ ये मुफ़लिसी है

06. श्री सुजीत कुमार(भारत)-

यह न हिन्दू न मुसलमान है ये
सबकी बर्बादी का सामान है ये
सूखी शाखों की तरह ज़िद न करो
तोड़ डालेगा ये तूफ़ान है ये

07. श्री सुभाष शर्मा(यूएस)-

करोना वाइरस कोई भूत नहीं डरोना। 
सभंल कर चलो आओ प्यार करोना। 

08. श्रीमती प्राची चतुर्वेदी(यूएस)-

चिल्लाना आता नहीं हर बात पे,
खामोशी को मेरी तुम पढ़ लेना।
कड़वे शब्द मैं बहाती नही,
क्योंकि है रिश्तों की परवाह मुझे।।

09. श्रीमती शकुन शर्मा(यूएस)-

कोरोना वाइरस कहाँ कैसे एवं क्यू आया
कहाँ कैसे का जवाब तो मिल गया 
परंतु क्यू का सवाल बाक़ी है। 

10. श्रीमती मीरा सिंह(यूएस)-

अपने स्वार्थ को रखकर ताख पर 
जन उपकार कार्य नित्य वे करते 
कर्मधारी धैर्यधारी जन उपकारियों को 
मन बार - बार उन्हें करता नमन है

11. श्रीमती फरहा(यूएस)-

कभी मुझसे पूछो मैं क्या चाहती हूँ
मैं तुम से तुम्हारी वफ़ा चाहती हूँ

12. श्री मनीष गुप्ता(यूएस)-

पीड़ित ही विचरता कल्पना-लोक है
कविता का तो जनक ही मानव का शोक है
साक्षी इसका अतीत है,
क्रोङ्क्च वधिक को वाल्मीकि का शाप है

13. श्रीमती विनीता श्रीवास्तव(यूएस)-

शब्दों के धार बहुत तेज होते हैँ, 
चंद श्रुतियों में ही वेदों के भेद उभर आते हैँ
डरती हूँ,  कविता अच्छी ना रच जाए.

14. श्री सन्तोष खरे(यूएस)-

भेजा हायपर्टेक्स्ट पे माँगा था जेसोन 

15. श्री अजय अज्ञात(भारत)-

सजाए रक्खो इस बाज़ार को तुम
अभी बाक़ी है मेरा ख़र्च होना

16. श्री नरेन्द्र शर्मा"खामोश"(भारत)-

चौकस है रहना,चला है करोना,
अभी दूर से ही नमस्ते भली है,
न नज़दीक़ आना,बला है करोना।

17. श्री आशीष सिंह(यूएस)-

किसने कब ऐसा सोचा था, इक दिन ऐसा भी आएगा ।
अपने अपने घर होंगे सब, और काव्य पाठ हो जाएगा ।।

18. श्रीमती मुदिता निगम(यूएस)-

घर की इस चारदीवारी में हम बैठे-बैठे बोर हुए
रुचियों की बन्द पड़ी गाड़ी में ईंधन डालें गीतों का

19. श्रीमती इन्दु "राज" निगम(भारत)-

आज हम सब एक गर हो जाएँगे
ज़िन्दगी को राह पर ले आएँगे
वक़्त है नाज़ुक बड़ा ये जान लो
वरना फिर हम तुम बहुत पछताएँगे
     
20. श्री राजेन्द्र निगम "राज"(भारत)-

अक्सर मिलने-जुलने से भी, तो मुश्किल बढ़ जाती है
घर में रहना, दौर बुरा है, बाहर जाना मत यारों....
दूजों का हक़ मत मारो, सामान ज़रूरी ही लेना
ऐसे हालातों में यूँ, अम्बार लगाना मत यारों.........

अन्त में परम्परा की संयोजिका श्रीमती इन्दु "राज" निगम के धन्यवाद ज्ञापन के साथ ही गोष्ठी का समापन हुआ। ज्ञात हो कि डिजिटल गोष्ठी की परिकल्पना एवम तकनीकी सहायता भारत में श्री अनिमेष निगम, श्रीमती प्रेरणा गोयल तथा यू एस में श्री आशीष सिंह एवम श्रीमती मुदिता निगम द्वारा प्रदान की गई।

 

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