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पावसी नवगीत
July 13, 2020 • राजेन्द्र श्रीवास्तव  • गीत/गजल
*राजेन्द्र श्रीवास्तव 
 
बंजारों ने रुक कर मानो 
डाले डेरे हैं 
 
काले बादल आसमान पर
आज घनेरे हैं
बंजारों ने रुक कर मानो
डाले डेरे हैं
 
साथ हवा के उड़-उड़ कर यह
आते-जाते हैं
टकराते हैं कभी परस्पर
फिर बतियाते हैं
अन्जानों जैसे आपस में 
फिर मुँह फेरे हैं
 
नाच रहीं हैं चमक-दमक कर
चपला-नर्तकियाँ
बदल रहें हैं मेघ निरंतर
नभ में आकृतियाँ 
नीलगगन पर श्वेत-श्याम 
चलचित्र उकेरे हैं 
 
कहीं विखेर रहीं  बूँदें कुछ 
 छटा इंद्रधनुषी 
बदरी, सूख रही धरती पर
कहीं खूब बरसी। 
जल की बूँदों के, जल पर ही-
वर्तुल घेरे हैं. 
*विदिशा म.प्र 
 

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