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पानी , पानी फेर न दे
August 24, 2020 • ✍️अशोक 'आनन' • गीत/गजल

✍️अशोक 'आनन'
 
रुई के फाहे से 
लगते बादल  -
आसमान के घावों पर ।
 
मेघ - गर्जना से
छलनी -
बदन  हुआ है ।
घाव से 
लहू - पीव  -
सतत चुआ है ।
 
राम जाने  
कब चलेगा -  
आसमान अपने पांवों पर ।
 
नील गगन का 
बदन -
हुआ है काला ।
चीख सुन
होंठों का  -
खुल गया है ताला ।
 
फिर भी उनकी 
कृपा बरसी -
शहर हो या गांवों पर ।
 
दुनिया ने
इनको -  
जी भरकर कोसा ।
पीड़ा की पत्तल में 
खूब -
दर्द परोसा  ।
 
पानी  
पानी फेर न दे  -
मेघों के सद्भावों पर  ।
 
*मक्सी,जिला-शाजापुर ( म.प्र.)
 

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