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निमंत्रण पत्र
February 6, 2020 • उर्मिला शर्मा  • कहानी/लघुकथा

*उर्मिला शर्मा 
       इज स्मिता को अपने विभाग में एक निमंत्रण पत्र मिला ।वह आमंत्रण नवरात्रि के दौरान एक 'डांडिया नाइट' आयोजन का था। उसका मन उत्साह से भर उठा । मन ही मन सोचा वह जरूर जाएगी अपनी सहेली प्रिया के संग। ऐसे कार्यक्रमों में वह उसी के साथ तो जाया करती है । चुकि स्मिता उत्सवधर्मिता, साहित्य व कर्णप्रिय थी इसलिए सांस्कृतिक कार्यक्रमों एवं कवि सम्मेलनों में जाने का सुअवसर वह न गंवाती थी। वैसे भी उनके छोटे से शहर में इस यरह के आयोजन कम ही हुआ करते हैं । और डांडिया नाइट जैसे प्रोग्राम्स तो अभी एक-दो सालों से ही उसके शहर में होने आरंभ हुए थे। 
               उसे  जाने का  खूब मन था। वह कई सामाजिक-पारिवारिक समारोहों में भी प्रायः  जाने से  वंचित रह जाती थी क्योंकि अक्सर  समारोह रात्रि में होते हैं जहाँ से  उसे  अकेले  वापस लौटने  में  समस्या होती थी । जहाँ तक संभव होता वह प्रिया को संग ले जाती । किंतु रात में दोनों  सहेलियों को अकेले लौटने में असुविधा और असुरक्षा दोनों की समस्या थी। फिर भी उसने सोचा कि वह 'डांडिया नाइट ' जरूर जाएगी जरूर और  वापसी में प्रिया के बेटे को बुला लेगी । इन्हीं सब बातों को को सोचते हुए वह शाम को निमंत्रण पत्र को उलट-पुलट रही थी । तभी कार्ड के  बायीं तरफ नीचे की ओर लिखा था- "भारतीय परिधान में केवल युगल जोड़ का प्रवेश" । यह क्या? स्मिता का मन जो अबतक उमंगित था,  वह फूले हुए गुब्बारे में सुई चुभोने सा फिस्स हो गया । घोर निराशा में वह डूबने लगी। इतनी भी बडी  बात न थी। नहीं जाती तो न जाती डांडिया नाइट में । क्या हो जाता ? जीवन में न जाने ऐसे कितने अवसर आए जब उसने असंख्य तरीकों से मन को मारा है । 
        लेकिन स्मिता के मन के भीतर एक हलचल सी मची हुई थी । अक्तूबर के इस संध्या में जब शिशु शरद अपने आगमन का दस्तक दे रहा था तब भी वह तन एवं मन दोनों से ही जून की तपती दुपहरी सा महसूस कर रही थी । मन बडा ही बेचैन था। ये 'युगल-जोड़ी' शब्द उसे बींध रहे थे । क्या, क्या होता है युगल जोड़ का अर्थ ? दो व्यक्तियों का संग ही ना। या केवल नर और मादा का युग्म । क्या समझे वह ? इस निमंत्रण पत्र में इस शब्द का क्या आशय है? समझ तो वह रही है फिर भी स्वयं से प्रश्न कर रही है और उत्तर भी स्वयं ही देती है । उसने ठान लिया कि जाएगी तो वह अपनी सखी प्रिया के ही संग। अगर कोई आपत्ति व्यक्त करेगा तो वह पूछेगी कि वह और उसकी सखी क्या युगल नहीं हुए ? फिर सोचती है कि अगर यदि वहां उसके विभाग का कोई परिचित मिल गया तो व्यर्थ ही बात बनेगी । वे उसके पति नवीन के बारे में पूछेंगे । तब वह क्या जवाब देगी। क्योंकि जिस काॅलेज के समाजशास्त्र विभाग में उसने कुछ ही वर्षों से ज्वाइन किया है,  वहां नवीन तो काफी पहले से कार्यरत है । जिस त्रासदीपूर्ण  एवं यातनामय दांपत्य को वह वर्षों से एक छत के नीचे रहते हुए भोग रही है,  उसे कब तक बाहर आने से रोक सकेगी? वैसे भी लोगों की प्रश्नवाचक निगाहें उसे जब- तब असहज बनाते ही रहते हैं । उनके बीच शब्दहीनता की स्थिति सदैव बनी ही रहती है । वे दोनों ही एक- दूसरे से निस्संग बने रहते हैं । बस रह रहे हैं- एक छत के नीचे । दोनों ही अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा बचाए रखने के लिए । 
                आज स्मिता का मन क्षुब्ध है और स्वयं से ही सवाल-जवाब करने में लगा हुआ है । क्या सबका दांपत्य जीवन सुगमता व सफल ही होता है ? नहीं ना। तो! जिसका कटु वैवाहिक संबंध है उस स्त्री का 'मन' नहीं होता । अनेक स्थलों और अवसरों पर वह अन्य दंपतियों  की तरह पति के साथ शिरकत नहीं कर पाती। भीतर ही भीतर वह अवसाद और हीनभावना का शिकार होती है । क्या एक स्त्री को अकेले खुश होने का अधिकार नहीं है ?  आज दोपहर से स्मिता को 'युगल ' शब्द उसके मन -मस्तिष्क  को झकझोरे जा रहा था । अकेले वह जा नहीं सकती । आक्रोश में वह मन ही मन सोचती है कि ठीक है 'युगल ' की बात है तो मान लो किसी पुरुष मित्र या रिश्तेदार को ले लेगी । लेकिन नहीं । हमारा 'मिडिल क्लास ' सामाजिक सोच इसकी भी अनुमति न देगा । यानि कि कुल मिलाकर हमारा पुरुष प्रधान समाज एक स्त्री को सम्मान पूर्वक जीने के लिए कुछेक विकल्प ही छोड़ता है । कदम-कदम पर उसे समझौता करना पड़ता है । न जाने एक स्त्री को अपनी ही रूढिबद्ध संस्कारों से मुक्त होने में और कितना वक्त लगेगा ।
 
*उर्मिला शर्मा 
 हजारीबाग झारखंड 
 
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