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नि: शब्द
June 9, 2020 • डॉ. येशुक्रिती हजारे • कविता

*डॉ. येशुक्रिती हजारे

मैं चल पड़ी हूँ
उस पथ पर
डगमगाते है पग मेरे 
निराशाओं में घिरते जाती, 
दु: ख और सुख की अनुभूतियों
में  मैं खो जाती हूँ 
निहारू निरंतर भावों को, 
शब्द न जाने कहाँ खो गये
नि: शब्द हुई मेरी कविता |
 
मैं हुई एकांकी
प्यासे हुए मेरे भाव
बंद कमरे में, 
जिंदगी ठहर सी गई |
 
इंद्रधनुष के रंगों को देखकर
मैं समेटना चाहती हूं
सतरंगी  इंद्रधनुष  के रंगों को 
जीवन में ढालना चाहती हूंँ
तुम्हारे ही रंग में रंगना चाहती हूं
फिर भी भाव न बनते 
हृदय प्रफुल्लित होता निरंतर, 
खिल उठता रोम- रोम, 
फिर भी भाव न बनते |
 
कल्पनाओं की उड़ान नहीं बनती, 
यथार्थ में जीने की आदत हो गई है
धुंधले दिखाई देते हैं सब
कल्पनाओं के चित्र , 
जिंदगी बदरंग सी हो गई है 
क्या उषा, क्या निशा, 
 कल्पनाओं की उड़ान , 
अब तमस में सिमट कर रह गई है...
*डोंगरगढ़ , जिला राजनांदगाँव (छत्तीसगढ़)
 

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